सोमवार, जून 09, 2008

पत्नी का 'पंच'

आज कल ऐसा हो गया है कि पत्नी के सामने उफ् करना भी मुश्किल है- वो हैं तो हाउस वाइफ, लेकिन 'पंच' किसी एड फिल्ममेकर से कम नहीं। कभी कह कर देख लो- 'क्या लगी रहती हो दिन भर नाच गाने में यार, सास-बहू से मोह भंग हुआ तो रियालिटी शो के फेविकोल से चिपक गई'। इतना अच्छा डायलॉग बना कर रखा है, 'ये रियालिटी नहीं भइया, फैटसी है' लेकिन अक्सर इसे मारने से डर लगता है, करें क्या बच्चे भी उसी फेविकोल से चिपके हुए हैं.

कहने का मतलब, घर में बहुमत 'रियालिटी शो' के पक्ष में है. अल्पमत में रहते हुए उफ् करना कितना मुश्किल होता है, ये लोकतंत्र में किसी से छुपा है. वो चाहे देश हो या घर क्या फर्क पड़ता है.

कल हंसते हंसते वो डायलॉग मार ही दिया- ये रियालिटी नहीं भैया, फैटसी है।

बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी, कि तीर की तरह निकला पत्नी का पनपनाता हुआ पंच-
'आपके 'भगवान दर्शन' से तो बेहतर है भाई साहब!...आप गौर नहीं फरमाते इसी फैटसी से आप लोगों का बेड़ा पार लग रहा है, अपने न्यूज चैनल पर तो जैकेट बदल बदल कर तीन तीन साल पुराने चुराने चुटकुले को कभी 'हंसी के हंसगुल्ले' बनाकर, तो 'कभी हंसी का गोला', 'कभी कमाल की कॉमेडी', तो 'कभी मस्ती की पाठशाला' का हेडर मार मार कर चार चार बार दिखाते हो यही फैटसी, प्राइम टाइम तक को तो बख्शा नहीं। घर में आकर इतना सड़ा हुआ हो गया रियालिटी?'

अब कीजिए बचाव, गनीमत है पत्नी ने भाई साहब कहा था (मतलब खुश थी)

'नहीं, नहीं, वो मतलब नहीं है मेरा, मतलब ये है कि कहीं कोई ईमानदारी तो होती नहीं इन शोज में, कभी अपने पंसद के कंटेस्टेंट्स को जीतते हुए देखा है, हजारों एसएमएस भेजने के बाद कभी करोड़पति, या पांचवीं पांचवी से कॉल आया?'

अब बनाईए कोई कनविंसिग डायलॉग, पत्नी ध्यान से सुन रही है, शायद अगले पंच की तैयारी कर रही है।

'बड़ी अक्ल वाले हो गए हैं छोटे पर्दे के मालिक...'

'वो तो है...'

'देखती नहीं हो, शारे शो बच्चों के पढ़ने के टाइम पर ही बना रखे हैं, बच्चे शो देखेंगे तो एड के वक्त भी चिपके रहेंगे, फिर चिप्स, चॉकलेट, और कुरकुरे मांगेगे, बड़े एसएमस पोल करेंगे सो अलग, घर में घुस कर सपने बेच रहे हैं साले...हमसे पूछ कर हमीं को लूट रहे हैं...!'

ना ना, पत्नी को कंजूसी कराने का ये फॉर्मूला शायद कनविंसिंग नहीं लगा, कुछ और ढूंढिये!

'दरअसल अच्छा नहीं लगता, दिन भर खबरों की सड़ी गली रियालिटी को निपटा कर आते हैं, मूड खराब हो जाता है, घर आते ही ये फैंटसी देख कर दिमाग की नस फटने लगती है...'

मुझे पता है पत्नी को मेरे दिमाग की नस की चिंता है, लेकिन मुझे क्या पता था, इस डॉयलॉग के बाद बात वहीं पहुंच गई है जहां से शुरू हुई थी...

'वही तो मैं भी कहती हूं, मेरी जान, जैसी खबरें आप लोग दिखाते हो, उसके लिए दिमाग की नस क्या ताननी, खुराक तो तय लगती है आप लोगों की। दिन भर या तो क्रिकेट, क्राइम या सिनेमा है(3Cs), इन सबके बीच ठूंसने के लिए हजार चीजें हैं, शुक्र है, मंगल है, शनि है, एलियन हैं, यूएफओ हैं, और तो और अब भेड़ बकरी और बंदर सियार भी हेडलाइन बनाने के लिए काफी है. कुछ नहीं और नहीं तो खली है ही. इंडिया आने के बाद उसकी तो टीआरपी अच्छी खासी हो गई है. पहले तो इस 'खलबली' को कुछ चैनल अछूत मानते थे, अब वो भी इस पर लौट आए हैं. बहार ही बहार है, इसमें दिमाग की नस फटने वाली क्या बात है...

मेरी चुप्पी पर पत्नी को लगा जैसे उसने वाकई नस पकड़ ली हो.

'तुम न, ज्यादा टेंशन लेते हो, अच्छा ही है जो चार पांच बार रियालिटी शो चला देते हो, खाने पीने का टाइम तो मिल जाता है, वर्ना इतनी मेहनत से बनाया गया टिफिन घर वापस लाते थे। तुम्हारी नजर में फैंटसी ही सही, सेहत के लिए बढ़िया है रियालिटी।'

कहां तो मुझे पत्नी को कनविंस करना था, पत्नी ने मुझे ही स्पीचलेस कर दिया

'तुम्हारी ही नहीं, मालिक की भी सेहत ठीक रहती होगी, कुछ तो बेहतर टीआरपी मिलती होगी'
बच गए भैया, यही एक खेल था जो पत्नी से शेयर नहीं किया- टीआरपी का खेल (खबर बनाने का खेल), वरना पंच इससे भी ज्यादा चांटेदार होता, लेकिन लगता है भनक लग ही गई है. हर हफ्ते पूछती हैं, कौन नंबर वन आया है इस बार. अब पत्नी होने के नाते इतना तो बताना ही पड़ता है. फिर इसके आगे उनको कुछ बताने की जरूरत नहीं पड़ती. वो टीआरपी हासिल करने का पूरा तिकड़म समझ जाती हैं.
कहती है- अच्छआआआ...वो...हूंम्म्म....

अच्छा एक बात बताओ, ये साईं के वीडियो वाला क्या लफड़ा है, एक बता रहा है चमत्कार, तो दूसरा गरिया रहा है...

मैने तो हाथ ही जोड़ लिए भैया- 'रहने दो मेरी मां, नौकरी खाओगी क्या...!'

2 टिप्‍पणियां:

mahendra mishra ने कहा…

bahut badhiya dhanyawaad .

Udan Tashtari ने कहा…

जब इतना बात ही गये तो साईं के वीडियो वाला लफड़ा क्या है, वो भी बता ही देते तो हमारी भी जिज्ञासा शांत हो जाती. :)