रविवार, जून 22, 2008

आसक्त कहीं का...



कई बार डूबता है

एक डुबकी के बाद

पकड़ने की कोशिश करता है

पानी के अंदर उठ रहे बुलबुलों को

डरता है कि कहीं सतह पर जाकर शोर न कर दें

वो पानी के अंदर बुलबुले पकड़ रहा है.

शनिवार, जून 21, 2008

क्यों सर??

मैं चाहता हूं
मेरी भी कोई निशानी बची रहे. मैं चाहता हूं कुछ चीजों में मेरा अहसास बाकी रहे.

इस उतपाती दुनिया में रूह कांप जाती है, इस खयाल से ही कि हमारी जीती जागती ख्वाबों सी दुनिया कल सितारों की बात होने वाली है.

इसलिए, मैं चाहता हूं मैं न सही मेरे पांवों के निशान तो बाकी हों, जिन रिश्तों में पला बढ़ा हवाओं में उसकी खनक ही बाकी रहे.

सच कहूं- दिल से...
तो मैं दरअसल चाहता हूं पूरे आकार में मौजूद होना
हर उस तहरीर में
हर इक तदबीर में
उसकी हर तस्वीर में
तकदीर में...
शायद इसलिए नहीं...
कि रेखाओं को गवारा नहीं
मेरी गुजारिश तक भी!

कुबूल कीजिए सर,
शा...
सॉरी, शा से पहले बा होता है,
सो बाआ- आदब कुबूल कीजिए
जाने कौन सी बयार है, जो बदबू की तरह निकल रही है

ये सर हैं...जो कहते हैं, दुनिया टूटने वाली है, बिखरने वाली है, आफत आने वाली है धरती फटने वाली है, समंदर पलटने वाला है- हर तरफ आग ही आग, गोले ही गोले, ऐलान कर दो दुनिया का मटियामेट होने वाला है,
डराओ सालों फिजूलखर्च लोगों को, साले अपनी सैलरी की शान में संसार की लेनी कर रखी है, जल थल वायु हर तरफ नाश मचा रखा है, हार्ड अटैक से मरने दो सालों को...
अरे हमको तो हकीकत पता है न...खबर बनाओ और मस्त रहो...

पता नहीं क्यों
कयामत की तस्वीरें देखकर मेरे दिल में फिदायीन से खयाल उठते हैं. कभी नाज होता है अपनी धरती की ताकत पर, उसकी उर्जा पर,
लहरों की जिजिविषा पर...
उसके अंतः की आग पर
आंधी पर
इंसानी नाम वाले तूफानों पर
मंत्रमुग्ध हो जाता है मन
धरती के रौद्र रूप पर

फिर भी हम कितना तुच्छ समझते हैं अपने आगे

हम अक्सर भूल जाते हैं,
कि धरती हमें बरबाद करने के लिए नहीं डोलती,
वो हमें हमारे ही पापों से बचाने की जद्दोजहद कर रही है
वो हम सबकी जिंदगी की जंग लड़ रही है,
वो शांत हो जाएगी जो जंग में हम उसके साथ आएं

अरे महाराज,
आप भी कुछ साथ दीजिए,
जानते ही हैं स्वयं सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है
आगे बढिए जनाब।
अपने होने की कुछ तो निशानी दीजिए

क्यों सर,
ठीक कहा न?

सोमवार, जून 09, 2008

पत्नी का 'पंच'

आज कल ऐसा हो गया है कि पत्नी के सामने उफ् करना भी मुश्किल है- वो हैं तो हाउस वाइफ, लेकिन 'पंच' किसी एड फिल्ममेकर से कम नहीं। कभी कह कर देख लो- 'क्या लगी रहती हो दिन भर नाच गाने में यार, सास-बहू से मोह भंग हुआ तो रियालिटी शो के फेविकोल से चिपक गई'। इतना अच्छा डायलॉग बना कर रखा है, 'ये रियालिटी नहीं भइया, फैटसी है' लेकिन अक्सर इसे मारने से डर लगता है, करें क्या बच्चे भी उसी फेविकोल से चिपके हुए हैं.

कहने का मतलब, घर में बहुमत 'रियालिटी शो' के पक्ष में है. अल्पमत में रहते हुए उफ् करना कितना मुश्किल होता है, ये लोकतंत्र में किसी से छुपा है. वो चाहे देश हो या घर क्या फर्क पड़ता है.

कल हंसते हंसते वो डायलॉग मार ही दिया- ये रियालिटी नहीं भैया, फैटसी है।

बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी, कि तीर की तरह निकला पत्नी का पनपनाता हुआ पंच-
'आपके 'भगवान दर्शन' से तो बेहतर है भाई साहब!...आप गौर नहीं फरमाते इसी फैटसी से आप लोगों का बेड़ा पार लग रहा है, अपने न्यूज चैनल पर तो जैकेट बदल बदल कर तीन तीन साल पुराने चुराने चुटकुले को कभी 'हंसी के हंसगुल्ले' बनाकर, तो 'कभी हंसी का गोला', 'कभी कमाल की कॉमेडी', तो 'कभी मस्ती की पाठशाला' का हेडर मार मार कर चार चार बार दिखाते हो यही फैटसी, प्राइम टाइम तक को तो बख्शा नहीं। घर में आकर इतना सड़ा हुआ हो गया रियालिटी?'

अब कीजिए बचाव, गनीमत है पत्नी ने भाई साहब कहा था (मतलब खुश थी)

'नहीं, नहीं, वो मतलब नहीं है मेरा, मतलब ये है कि कहीं कोई ईमानदारी तो होती नहीं इन शोज में, कभी अपने पंसद के कंटेस्टेंट्स को जीतते हुए देखा है, हजारों एसएमएस भेजने के बाद कभी करोड़पति, या पांचवीं पांचवी से कॉल आया?'

अब बनाईए कोई कनविंसिग डायलॉग, पत्नी ध्यान से सुन रही है, शायद अगले पंच की तैयारी कर रही है।

'बड़ी अक्ल वाले हो गए हैं छोटे पर्दे के मालिक...'

'वो तो है...'

'देखती नहीं हो, शारे शो बच्चों के पढ़ने के टाइम पर ही बना रखे हैं, बच्चे शो देखेंगे तो एड के वक्त भी चिपके रहेंगे, फिर चिप्स, चॉकलेट, और कुरकुरे मांगेगे, बड़े एसएमस पोल करेंगे सो अलग, घर में घुस कर सपने बेच रहे हैं साले...हमसे पूछ कर हमीं को लूट रहे हैं...!'

ना ना, पत्नी को कंजूसी कराने का ये फॉर्मूला शायद कनविंसिंग नहीं लगा, कुछ और ढूंढिये!

'दरअसल अच्छा नहीं लगता, दिन भर खबरों की सड़ी गली रियालिटी को निपटा कर आते हैं, मूड खराब हो जाता है, घर आते ही ये फैंटसी देख कर दिमाग की नस फटने लगती है...'

मुझे पता है पत्नी को मेरे दिमाग की नस की चिंता है, लेकिन मुझे क्या पता था, इस डॉयलॉग के बाद बात वहीं पहुंच गई है जहां से शुरू हुई थी...

'वही तो मैं भी कहती हूं, मेरी जान, जैसी खबरें आप लोग दिखाते हो, उसके लिए दिमाग की नस क्या ताननी, खुराक तो तय लगती है आप लोगों की। दिन भर या तो क्रिकेट, क्राइम या सिनेमा है(3Cs), इन सबके बीच ठूंसने के लिए हजार चीजें हैं, शुक्र है, मंगल है, शनि है, एलियन हैं, यूएफओ हैं, और तो और अब भेड़ बकरी और बंदर सियार भी हेडलाइन बनाने के लिए काफी है. कुछ नहीं और नहीं तो खली है ही. इंडिया आने के बाद उसकी तो टीआरपी अच्छी खासी हो गई है. पहले तो इस 'खलबली' को कुछ चैनल अछूत मानते थे, अब वो भी इस पर लौट आए हैं. बहार ही बहार है, इसमें दिमाग की नस फटने वाली क्या बात है...

मेरी चुप्पी पर पत्नी को लगा जैसे उसने वाकई नस पकड़ ली हो.

'तुम न, ज्यादा टेंशन लेते हो, अच्छा ही है जो चार पांच बार रियालिटी शो चला देते हो, खाने पीने का टाइम तो मिल जाता है, वर्ना इतनी मेहनत से बनाया गया टिफिन घर वापस लाते थे। तुम्हारी नजर में फैंटसी ही सही, सेहत के लिए बढ़िया है रियालिटी।'

कहां तो मुझे पत्नी को कनविंस करना था, पत्नी ने मुझे ही स्पीचलेस कर दिया

'तुम्हारी ही नहीं, मालिक की भी सेहत ठीक रहती होगी, कुछ तो बेहतर टीआरपी मिलती होगी'
बच गए भैया, यही एक खेल था जो पत्नी से शेयर नहीं किया- टीआरपी का खेल (खबर बनाने का खेल), वरना पंच इससे भी ज्यादा चांटेदार होता, लेकिन लगता है भनक लग ही गई है. हर हफ्ते पूछती हैं, कौन नंबर वन आया है इस बार. अब पत्नी होने के नाते इतना तो बताना ही पड़ता है. फिर इसके आगे उनको कुछ बताने की जरूरत नहीं पड़ती. वो टीआरपी हासिल करने का पूरा तिकड़म समझ जाती हैं.
कहती है- अच्छआआआ...वो...हूंम्म्म....

अच्छा एक बात बताओ, ये साईं के वीडियो वाला क्या लफड़ा है, एक बता रहा है चमत्कार, तो दूसरा गरिया रहा है...

मैने तो हाथ ही जोड़ लिए भैया- 'रहने दो मेरी मां, नौकरी खाओगी क्या...!'

गुरुवार, जून 05, 2008

एक तस्वीर कु-बोली के खिलाफ


बंदरिया की गोद में पिल्ला! इंसान के लिए सबक हो या न हो (क्योंकि ये लेने पर डिपेंड करता) इस तस्वीर से जो जाहिर है वो मूलतः एक क्रिया है- प्रतिक्रिया (भाषाई) से बिना शक बेहतर. तस्वीर की कहानी कुछ यूं है- जम्मू के एक इलाके में एक कुतिया रहती थी. अभी कुछ दिन पहले वो बीमारी की वजह से गुजर गई- अपने इस इकलौते पिल्ले को अकेला छो़ड़कर. बशिंदों के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं थी (दरअसल कोई घटना ही नहीं थी.) लेकिन कभी कभार गांव में आने जाने वाली इस बंदरिया का दिल पसीज गया जब उसने अकेले में पिल्ले को कूं...कूं करते देखा. वो उसे उठा ले गई. इस पर लोगों का ध्यान तो जरूर गया- अरे, बंदरिया पिल्ले को उठा ले गई, चलो जाने दो, मुसीबत गई, जैसा मुंह वैसा रियेक्शन. लेकिन बंदरिया ने जिस हिफाजत और प्यार दुलार से पिल्ले का पालन पोषण शुरू किया, उसे देख सब दंग रह गए.


जो रिश्ते शब्दों की वजह से टूट रहे है, भाव ने उसे नया जन्म दे दिया.


कौन कहेगा, इंसानियत सिर्फ आदमी की जागीर है?

मंगलवार, जून 03, 2008

अगर आप ईश्वर को मानते हैं तो...

मानना उस अर्थ में नहीं, जैसा टीवी की खबरों में दिखाया जा रहा है- मंगल के दिन शनि का जन्मदिन मनाया जा रहा है, कुछ अबूझ तस्वीरों के जरिये ब्रह्मांड का रहस्य सुलझा लेने का दावा किया जा रहा है. और तो एक धुंधले सफेद साये को साक्षात ईश्वर का रूप बताया जा रहा है, गजब का कन्फर्मेशन है टीवी एंकर्स की भाषा में...!

निराधार...! बकवास...!! कोरा अंध-विश्वास...!!!
ग्रहों पर जीवन की तलाश अलग बात है, लेकिन ईश्वर की साक्षात तस्वीर पर मुहर? विज्ञान इसकी कतई इजाजत नहीं देता. वो चीजों के सापेक्ष संतुलन को समझता है, और जिस सीमा के बाद गणना शून्य के नीचे चली जाती है...वहां इनफिनिटी का मार्क लगा देता है. मतलब, जो दिख जाए, वो ईश्वर ही क्या. फिर तो वो संग्रहालय में कैद किया जाने वाला आइटम बन जाए. आदमी इतने सवाल कर बैठेगा- ये क्यों, वो क्यों, ये ऐसे क्यों, वो वैसा क्यों, कि वो अपना सिर पटक लेगा, वो पागल हो जाएगा. अपने ही रचे ब्रह्मांड के संतुलन को लेकर कन्फयूज हो जाएगा.
आदमी अपनी संरचना तो समझ नहीं पा रहा. जबकि सभी धर्मोंग्रन्थों में ये कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में कहा गया है इंसान ब्रह्मांड की पहली कड़ी है. इसका पूरा रहस्य खुद उसके अंदर है. आदमी समेत हर सजीव का मन (एक अदृश्य अंग) जीवन के संतुलन का सबसे बड़ा कारक है. ये वो कोना है जो पूरी तरह 'लीकेज प्रूफ' है, इसमें तीनों काल-भूत भविष्य और वर्तमान समाहित है. उसने क्या किया है, क्या करने वाला है और क्या कर रहा है तमाम सूचनाएं भरी होती है. बुरी से बुरी भावना, घृणा, द्वेष, कटुता, पशुता, लालच, घमंड, जो भी कह लें सब इसी में कैद है, लेकिन इसका पता सामने वाले को नहीं चलता. पता वही चलता है, जिसे हम चाहते हैं, जिन्हें हम शब्द देते हैं.
यानी दो जीवों (आदमी समेत) के बीच का संतुलन हमारी भाषा पर डिपेंड करता है. अगर खराब होता है, तो उसके लिए सीधे-सीधे जिम्मेवार हम हैं, ईश्वर नहीं, क्योंकि संतुलन कायम रखने के लिए उसने लीकेज-प्रूफ मन दिया, लेकिन हमने उसे जाहिर करने के लिए छीछालेदार भाषा बना दी. तेल, पानी, गैस (और बेशक ब्लॉग) के झगड़े कहने को है, दुनिया के तमाम कलेश की वजह है हमारी कलुषित भाषा,जो मन के उन तमाम कलुष विचारों से पैदा होती है, जिन्हें ईश्वर के नियम के मुताबिक मन की कालकोठरी से बाहर नहीं आने देना है. संतुलन के लिए निजता हर हाल में कायम रहनी चाहिए. क्योंकि जब इसपर चोट होती है, तो फिर इंसान ईश्वर को भी नकारने पर उतारु हो जाता है.
भाषा अपने मूल रूप में पानी की तरह सहज होती है, लेकिन आदमी की आदिम आदत है, वो अपनी भाषा से अलौकिक संतुलन का कबाड़ा करता रहा है. जिस किसी ने भी व्यंग्य विधा की रचना की होगी, उसने आदमी की इसी कमजोरी की नस पकड़ी होगी- कि उसकी आदत भी निबह जाए और बात भी न बिगड़े, उसके मन का कलुष, उसकी तल्खी जब निकले, तो हास्य की चासनी में लिपट कर, लेकिन लगता है अब आदमी का काम अब भाषा की इस चासनी से काम नहीं चलने वाला.
ये कोई प्रवचन नहीं, मैं धार्मिक परिभाषा के मुताबिक निहायत ही नास्तिक आदमी हूं. वो तो आदमी के बीच बिगड़ते संतुलन ने मन में ईश्वर का खयाल ला दिया. सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर यूं ही चलता रहा तो क्या होगा उसके हैरतअंगेज संतुलन का. आप तो खैर ब्लॉग-ब्लॉग भटकने वाले पाठक हैं, देख ही रहे होंगे, भाषा के नाम पर कैसी गंद मची है, मौलिक रूप में ब्लॉग तो वो जगह है, जो किसी भी और माध्यम- टीवी, रेडियो, अखबार हर माध्यम से ज्यादा जुड़ने का मौका आदमी को देता है. लेकिन यहां तो निजी छींटाकशी का दौर चल पड़ा है. कई कई ब्लॉग तो ऐसे हैं, जिन्हें आप सार्वजनिक रूप से पढ़ नहीं सकते.
जुड़ने से ज्यादा पुरानी दोस्ती तक टूट रही है.
कुछ करना होगा बंधू!