सोमवार, मई 26, 2008

माई नेम इज आरुषि!

'मम्मा, अरे इधर आओ जल्दी, अरुषि को उसके पापाने ही मारा है...देखो टीवी पर क्या आ रहा है...'
बेटी की आवाज लगभग चीख रही थी. बहुत तेज नहीं थी, पर इतनी बेचैनी से भरी थी कि मेरी गहरी नींद भी खुल गई. 18 घंटे के बाद सोया था. रात भर जागने के बाद देर दफ्तर से लौटा था. नींद खुल गई थी, लेकिन बिस्तर से उठकर ड्राइंग रूम में जाने का मन नहीं किया, मैं बिस्तर पर पड़े पड़े बेटी की बेचैनी, उसके चेहरे के बदलते हाव भाव देखता रहा. 11 साल की है. अब वो हर बात समझती है. इस उम्र में स्थिरता कहां होती है.

कभी मेरी डायरी में लिखी एक कविता पढ़कर उसे चहकते देखा था, वो कविता क्या उसी से जुड़ी एक घटना थी, जिसे मैने डायरी पर कहीं दर्ज कर दिया था-
"पापा, वो देखो ना, कितना सुंदर है वो अमरूद
देखो, कितना पीला, कितना खुशबूदार
पापा, मेरे हाथ पहुंच नहीं रहे
अपने कंधे पर चढ़ा लो ना
कंधे पर खड़े होकर बेटी ने तोड़ लिया अमरूद
खुशी इतनी जैसे जमाना जीत लिया हो
बेटियां जो बाप के कंधे पर होती हैं
इसी तरह आसमान छूती हैं."


तब उसने गोद में चढ़ते हुए कहा था, पापा आपने गांव वाली उस घटना का कविता बना दिया है न...मैं समझ गई, मैने ही तो आपके कंधे पर चढकर अमरूद तोड़ा था.

मैं पिछले कई दिन से देख रहा था, अखबार, टीवी, हर जगह वो अरुषि से जुड़ी खबर को फॉलो कर रही थी, लेकिन एक बार भी सीधे पूछा नहीं, पापा, ऐसा क्या हुआ कि एक पिता ने बेटी को मौत के घाट उतार दिया. शायद उसे भी कोई असमंजस हो...

ये सबकुछ मैं बिस्तर पर लेटे ही सोच रहा था, करवट बदला तो उसका स्केच बुक हाथ लगा- जिसके एक पेज पर पेंसिल से एक लड़की की आकृति बनी हुई थी, उसके नीचे लिखा था- माइ नेम इस आरुषि...
देर तक मैं उस स्केच को देखता रहा, टीवी पर आ रही खबरों के शोर से अलग मुझे उसमें एक ऐसी छाया दिखाई थी, जो देह से अलग होने के बाद रूह बन जाती है, सबके दिलों में बस जाती है. मेरे शब्दों में कुछ इस तरह-
मैं आरूषि हूं
जाना पहचाना है मेरा नाम
आप लोग यही सोच रहे होंगे
किसी की परछाई हूं मै
मैं परछाई नहीं एक रूह हूं.
नाजुक सी, बड़ी पाक सी
एक छोटी सी मुस्कराहट
जो लग जाऊं दूधमुंहे बच्चे के मुंह
तो ममता के मुंह में पानी भर जाऊं
अन्नमुंहे के होंठों पर पसर जाऊं
तो शरारत बन जाऊं
आशिक के लब पर लग जाऊं
तो लाजवाब बन जाऊं.
मैं एक रूह हूं सिर्फ, मेरा नाम आरुषि है.
इस नाते मैं आपमें भी हूं, और उसमें भी.
उसकी शक्ल में मुझे अपनी रूह दिखाई देती है.
मैं किसी की परछाई नहीं, फिर भी.
उसकी कुछ कहती हुई आंखों के शोर में अनसुनी हुई जाती हूं.
याद तो आपको भी होगी वो तस्वीर.
आप ही ने तो दिखाई थी,
वरना, मैं कहा देख सकती थी बेसुध बंजारन.
उस खामोश तस्वीर ने जैसे मेरी पहचान तय कर दी हो.
बस, इतने भर की आरुषि हूं मैं.

बुधवार, मई 14, 2008

कमिंग अप...


अरसा हो गया आपसे मुखातिब हुए.
आप उपरोक्त वाक्य की नाटकीयता पर मत जाइए, वाकई अरसा हो गया खामोश हुए.
आप कह सकते हैं इस खामोशी को निर्जन चुप्पी, एक मरी हुई खामोशी. मैंने अपने होने का आखिरी निशान (पोस्ट) मोहब्बत के पर्व से ठीक एक दिन पहले दिया था (13 फरवरी), और आज जब मैं अपना होना फिर से साबित कर रहा हूं, ये आतंक की अगली रात है- जयपुर ब्लास्ट के गुबार से भरी हुई, खून में सनी, कराहों में लथपथ, टूटे हुए भरोसों की एक काली रात...
बात जिस निर्लज्ज नायक के साथ खत्म हुई थी, ये रात उससे कहीं ज्यादा खतरनाक हो चुकी है. वो नायक अपनी करतूतों की वजह से खुद हास्यास्पद हो गया है, वो जितनी जोर से मराठा राग अलापता है, खुद को महाराष्ट्र का अकेला हितैषी बताता है, लोग अब उतनी ही जोर से बोलने लगे हैं- देखो, फिर बोला राज, अगर हमारी टीवी की भाषा में कहें तो राज ने फिर उगली आग, फिर उगला जहर, अब आखिर हम कितनी बार कहें फिर, हर दूसरी बात तो ये फिर-फिर हो जा रहा है, 'राज' के साथ खबर की स्क्रिप्ट भी हास्यास्पद होती जा रही है, सो मैंने रियेक्ट करना छोड़ दिया...क्या मुंह लगाना!

लेकिन, ये चुप्पी ठीक नहीं थी...
पता नहीं आज ऐसा क्यों लग रहा है, क्यों लग रहा है कि आदमी का अपनी खोल में दुबक जाना खुदकुशी के बराबर है, गुलाबी शहर की जख्मी गलियों ने जागती आंखों के तमाम सपने बेमानी कर दिए हैं, डर लगता है अब कभी खुद को लेकर खुशफहमी पालने में, जिंदगी इतनी सस्ती हो चुकी है नफरत के सौदगारों के लिए. वैसे साबित तो इन्होंने कई बार किया है- कि जब जब कोई मजहब या पंथ, राष्ट्र या समुदाय का अगुवा बनने की कोशिश करता है, उसका इकलौता हितेषी होने का दावा करता है, वो फिर इंसान नहीं रह जाता, क्योंकि वो इंसानियत की कीमत पर अपने संबंधित समुदाय का अस्तित्व चाहता है, इसे हासिल करने के लिए वो लाशें बिछा सकता है, और जब उसका अस्तित्व कायम हो जाए, तो भी लाशें बिछाने का सिलसिला नहीं थमता, क्योंकि तब वो अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए वो तरकीब लगाता है- डिवाइड एंड रूल...

किसी को लग नहीं रहा है, लेकिन ये फार्मूला आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक हो चुका है. धमाके अब दहशत पैदा करने से ज्यादा, भाईचारा तोड़ने के लिए किये जा रहे हैं. आतंकवादी तो आतंकवादी दुनिया भर के सियासतदान भी यही फार्मूला अपना रहे हैं.

ये बेहद खतरनाक समय है, ये वक्त खामोश रहने का नहीं हैं, जिंदगी को हमें हमेशा 'टीज'* करते रहना होगा, ताकि अगली सांसों को चलते रहने का भरोसा पहले ही मिल जाए, टूटते हुए भरोसे को जुड़े रहने का आस मिल जाए, घुटती हुई आस को ख्वाबों का जहां मिल जाए, और दर्द से कराहते जहां के जख्म को इंसानी मरहम मिल जाए.
So, lets fire the band- Coming up next

*(टीवी की भाषा में टीज करना ब्रेक से पहले अगली खबर की झलक दिखाने को कहते हैं, ये दर्शको को बुलेटिन से बांधे रखने का पॉपुलर फार्मूला है.)