बुधवार, फ़रवरी 06, 2008

तेरा क्या होगा राज!


मै भारत के उत्तरी इलाके में पैदा हुआ हूं और इसमें मेरी कोई गलती नहीं. मैं न तो आज तक मुंबई गया हूं और न ही राज ठाकरे को जानता हूं- इसमें भी मेरी कोई गलती नहीं. राज ठाकरे को पहचानता जरूर हूं- टीवी और अखबारों के जरिए- ये मेरा दुर्भाग्य है कि न चाहते हुए भी उसकी छवि जेहन में साफ बसी हुई है- जबकि उसने चाचा ठाकरे का भतीजा कहलाने के सिवा कुछ खास हासिल किया नहीं है.

एक
ऐसा भतीजा, जिसने हर पल चाचा के जूते उतारने का इंतजार किया. अपने को चाचा के बेटे (उद्धव) से ज्यादा मेंटेन रखा. सजे संवरे जुल्फ, क्रीम से मला हुआ चेहरा और लिपकेयर लगे होंठ, यूनीफॉर्म की तरह चकाचक सफेद कुर्ता, और हां, वो कार्बन फ्रेम का चश्मा. वो जानता था- खुद को चाचा के बेटे से असरदार दिखने के लिए ठाट-बाट में एकरूपता जरूरी है. मैं फिर से कह रहा हूं- मैं उसे करीब से कतई नहीं जानता, ये इमेज, जिसे बयान कर रहा हूं टीवी और अखबारों की रपट से बनी है. मुझे उसके उमर के बारे में भी नहीं पता, दिखता तो मेरी उमर का ही है- इसलिए मेरा उसे 'अरे' कहना खटकना नहीं चाहिए. वो ऐसी कोई ऊंची चीज नहीं कि उम्र से आगे निकल जाए, बल्कि उसकी छिछोरी सोच तो उसे उम्र से नीचे गिराती है. उसे पता नहीं, ये और बात है. बल्कि मैं तो कहता हूं उसे बखूबी पता, तभी वो मुंबई को सिर्फ महाराष्ट्र का बताता है.

दरअसल, दूसरों की जूती पर नजर रखने वाले होते ही ऐसे हैं. जब अपनी बारी आती है, तो 'ओरिजिनल जूता पहने वाले' से भी दो कदम आगे बढ़कर हरकत करने लगते हैं. राज ठाकरे को बाला साहेब की जूती पहनने को तो नहीं, मिली जिसकी ताक में वो अधेड़ हो गया, और आज जब खुदा अपने लिए जूता बनाकर पहनना पड़ रहा है, तो ऐरु-गैरू-नत्थू-लखैरू को बटोर कर ऐसी हरकतें कर रहा है जो जिसकी कल्पना आज तक बाल ठाकरे भी नहीं किए होंगे. उत्तर भारतीयों से जलन उन्हें भी रही है जिस तरह वो मुंबई जाते हैं और अपने सपने को पूरा करने में खुद को झोंक देते हैं-प्रोफेशन कोई भी हो, हर जगह कामयाब होते हैं, लेकिन राज तो व्यावहार और सोच दोनों ही स्तर पर गुंडई का परिचय दे रहा है- बिलकुल किसी गुण्डे की तरह सीमित सोच है राज की. ऐसे शख्स के लिए दुनिया की हर भाषा का ग्रामर साफ तौर पर कहता है- इनके लिए आदर सूचक शब्द लगाना मना है, अगर आप ऐसा करते हैं, तो आप उसके कृत्य को स्वीकृत करते हैं. आखिर हम ये क्यों मान ले(विलास राव देशमुख की तरह) कि राज मुंबई का वो प्रतिनिधि है जो अमिताभ बच्चन से पूछे कि भैया, यूपी में स्कूल क्यों खोला, किसी मराठी फिल्म में काम नहीं किया, या मनोज तिवारी को धमकाए कि काम करते हो भोजपुरी फिल्मों में और रहते हो मुंबई में- क्या चक्कर है. राज होता कौन है बड़ा सवाल तो यही है.

दुनिया का कोई भी बुद्धिमान (सभ्य कहना ज्यादा उचित होगा, क्योंकि राज के पास कम बुद्धि नहीं) ये नहीं कह सकता कि संघ के कानून में बंधे किसी भी राष्ट्र के किसी भी शहर का दरवाजा नागरिकों के लिए उनके जन्मस्थान के मुताबिक खुलेगा. जो मुंबई में पैदा हुआ है मुंबई उसी की होगी. लेकिन राज तो मुंबई पर ऐसे हक जता रहा है जैसे मुंबई महाऱाषट्र की इकलौती पुत्री हो, और इसके आसपास आने वाले तमाम लोग इसे बुरी नजर से देखते हैं. ये माना कि राज मुंबई का एक जिम्मेदार नागरिक है, उसे भी (तमाम कई लोगों की तरह) शहर की चिंता है. ये बात भी मानने लायक है कि बढ़ते जनसंख्या दबाव के कारण शहर का बुरा हाल है, लेकिन राज जो कर रहा है उससे तो इस बात की गारंटी मिल रही है कि मुंबई या महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों में पैदा हुए लोग शहर को नुकसान नहीं पहुंचा रहे. पूरी दुनिया जानती है, कि मुंबई जिसके लिए बदनाम है वो किन लोगों की वजह से (उनका ओरिजिन क्या है) और अगर दुनिया के नक्शे पर इसकी पहचान है तो किनकी वजह से...(इनका ओरिजिन क्या है). सब जानते हैं मुंबई ठाकरे(ओं) की वजह से रौशन नहीं. ऐसे में इसकी बरबादी का दोष उत्तर भारतीयों पर थोपना वसुधैव कुटुंबकम का जाप करने वाले देश का अपमान है.

और जब तक देश का संविधान कायम है, देश का हर नागरिक आर्थिक राजधानी में 'घुस कर काम करेगा'. ये उसका हक है. और जिस दिन ये हक कानूनी तौर पर छीन लिया जाएगा, उस दिन देश देश न रहेगा

राज सोच लो उस दिन तेरा क्या होगा!

1 टिप्पणी:

अनुराग पुनेठा ने कहा…

ye raj tumara namak nahi kaya hai....ha ha ha. badiya bhaiye...lage raho