बुधवार, जनवरी 30, 2008

कहां हो बापू?

जाने कितने बरस पहले कह गए बापू, विकास को 'सबसे गरीब' की नजर से देखो, सबसे पहले गांव को सुधारो, हाशिये पर खडे आखिरी आदमी को मुख्यधारा में लाओ, संसाधनों का बांटवारा ऐसा करो, कि सबको बराबरी का अहसास हो, समाज में अपनी हिस्सेदारी का बोध हो, निहायत ही देशी अंदाज़ में समझाया बापू ने- जिनती कीमत वकील के काम की, उतनी ही कीमत नाई के काम की. लेकिन काहे को...ये ससुरे तो...

छोड़िए हम कौन होते हैं, इस बहस पर मुंहचोदी करने वाले, आपके पास टाइम भी तो नही, लेकिन जाने से पहले ऊपरवाले सीन को फिर से देखते जाईए कि बापू की बात न मानने का हस्र क्या होता है.

नेट सर्फिंग के दौरान कहीं से मिल गई थी ये तस्वीर, जो है भले ही सूडान की, इसमें नतीजा साफ दिखता है बापू की अनदेखी का. एक बच्चा मर रहा है- भूख से, बेचारा मर तो रहा था पैदा होने के बाद से ही, लेकिन इस वक्त उसका कंकाल ले रहा है आखिरी सांस. इसके ठीक पीछे ताक लगाए बैठा है चील- कि कब ये आदमी का बच्चा अपनी आखिरी सांस ले, और वो अपनी अंतड़ियों की ऐंठन शांत करें.
जरा गौर करिए चील की इंसानियत पर, वो चाहे तो 'मर चुके से' बच्चे को एक ही झपट्टे में साफ कर दे, लेकिन वो आदमी की अनदेखी से मर रहे बच्चे का आखिरी सांस लेने तक इंतजार कर रहा है. कितना दर्दनाक आदर्श स्थापित कर रहा है ये चील!

इससे भी खौफनाक है उस फोटोग्राफर केविन कार्टर की हकीकत, जो इस सीन को अपने कैमरे में कैद तो कर लाए, लेकिन इसके बाद चैन की नींद नहीं सो पाए, अपने ईर्द गिर्द बुनी हुई आधुनिकता से उन्हें घिन होने लगी, विकास के महल उन्हें खोखले नजर आने लगे, वो अवसाद में चले गए, तीन महीने बाद ही उन्होंने आत्महत्या कर ली!

मंगलवार, जनवरी 29, 2008

देखिए और बूझिए...


पहेली नहीं है कोई जनाब, सीन है, दो तस्वीरों का एक सीन. रचने वाले ने फिलॉसफी बड़ी अच्छी दी है- तस्वीरें बोलती हैं, और जब ये बोलती हैं, तो बंदे का चुप रहना ही बेहतर है. और इन दो चित्रों में तो और भी क्योंकि इनके किरदार बेहद साफ(फेमस) हैं. आखिर अमिताभ जी, अमर जी, जया जी, अभिषेक और ऐश को कौन नहीं जानता. मगर...

मगर, इन चित्रों में मौजूद ये 'मगर' तमाम किरदारों से बड़ा है- जिस तरह पूजा पर बैठे अभिषेख अमर सिंह जी की तरफ देख रहे हैं, और जिस तरह अमर सिंह जी के बगल में खड़ी जया जी 'सोचनीय' मुद्रा में खड़ी हैं. तो हम भी चुप ही हो लेते हैं, लेकिन उससे पहले संक्षिप्त भूमिका- एक तस्वीर तब की है जब ऐश के नाम पर बाराबंकी में कॉलेज खुला, और दूसरा एक अवार्ड फंक्शन, और ये दोनों ही तस्वीरें अलग अलग मौकों पर अलग अलग अखबारों में छप चुकी हैं. इंटरेस्टिंग लगीं हमें बस इसमें यही नई बात है. जिन्होंने भी इन्हें क्लिक क्या, बड़ा 'डिसाइसिव मोमेंट' कैप्चर किया है. तो बस देखिए और बूझिए...!