बुधवार, दिसंबर 31, 2008

आठ की याद

कभी फुरसत में होगी 'गए गुजरे' की बात
उम्मीदों से भरे लम्हें हैं
हथेली में भर लीजिए
चूम लीजिए ऐसे कि कुछ दिन रहे याद!
आप सबको मुबारक हो नया साल!!

अभी के लिए कुछ तस्वीरें, 21 वीं सदी के 8 वें साल की 8 निशानियां...
(सौ.-REUTERS)




मान गई मोहतरमा!
नई नवेली दुल्हन के साथ मैक्सिको के मैनुअल यूरीब


मैं भी बाइकर!
थाइलैंड का फैशनपरस्त पालतू मेंढक

१६०० सिंगार!
गहनों से बिंधी स्कॉटलैंड की महिला (मोस्ट पीयर्स्ड वूमन)



ईश्वरीय दोष!
नोयडा में पैदा हुई दो सिर वाली बच्ची

पाषाण युग की परछाई!इंडोनेशिया की एक जनजाति के बहाने...






परंपरा की लीपापोती!
हांगकांग में बुरी आत्माओं से बचने का एक तरीका





नौलखा नकाब!
बहरीन के एक फैशन शो में गहनों से लदी मॉडल




गुबार में सूखता पसीना!
काबुल के आटा मिल के बाहर मजदूर


रविवार, दिसंबर 07, 2008

ए बी सी डी से सीखो!


अंग्रेजी हम सबने पढ़ी है, लेकिन कभी सोचा है-
अंग्रेजी के शुरुआती चार अक्षर A, B, C, D का इस्तेमाल 1-99 तक की स्पेलिंग में कहीं नहीं होता!
D- का इस्तेमाल पहली बार Hundred में होता है
A- का इस्तेमाल पहली बार Thousand में होता है
B- का इस्तेमाल पहली बार Billion में होता है
C- का इस्तेमाल पहली बार Crore में होता है

मतलब...
इन अक्षरों की तरह आदमियों में भी इतनी सब्र हो, कि वो शांति से अपनी बारी का इंतजार करे। ये जरूरी है

इस क्रांतिकारी खोज का उल्लेख अमिताभ बच्चन ने अपने ब्लॉग http://bigb.bigadda.com/ पर किया है. इतने सुंदर संदर्भ के साथ कि मैं खुद को उसे चुराने से नहीं रोक सका, आप गौर करेंगे, तो अंग्रेजी वर्णमाला की इस विडंबना का संदर्भ इतना गहरा है कि किसी को भी झकझोर सकता है.
सॉरी बिग बी, जैसे आपके ब्लॉग पर एक क्लिक से मेरे अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ, मैं चाहता हूं मेरे ब्लॉग पर आने वाले 'टहलू' भी ऐसे सकारात्मक चोर बनें!

मंगलवार, दिसंबर 02, 2008

बस, यूं ही जलती रहे ये लौ!


मुंबई के आसमान में चांद मुस्करा रहा है
सचिन, संजु, आमिर, शाहरुख, बिग बी, सोनम, सोनू जैसे सारे सितारे उबल रहे हैं
नीचे जमीन पर मोमबत्तियों की लौ हर लम्हा तेज हो रही है
हर आखं में समा रही है झिलमिलाती हुई मोमबत्ती की सीधी सुंदर लौ
बुझती हुई सी आंखों में चौड़ी होती दिख रही है रौशनी
बस इतना ही चाहिए था!

शहीद बेटे के पिता के सीने में कुलांचे मार रही है बेटे सी हिम्मत
वो दिखा रहा है सीएम तक को दरवाजे से बाहर का रास्ता
‘जा चला जा, बड़ा आया है हमदर्द बनने, मुझे नहीं चाहिए तेरी छपट भरी सहानुभूति’
शहीद की बेवा बैरंग लौटा रही है सरकार की रुपयों से तोली हुई दया
बेटे के कंधे से गिर रहा ‘घड़े का पानी’ तर कर रहा है ‘कमीनों का पायजामा’
ताल ठोक कर कह रहा है बंधक-मैं तो फिर भी आउंगा ताज में,ओबेराय में
बस यही तो चाहिए था!

खबरों के बीच से गायब हो रही है ‘कॉमेडी’ की ‘गुदगुदी’
स्वर्ग-पाताल की चौहद्दी नापने वाले एंकरों की बदल रही है भाषा
रिपोर्टरों की पीटूसी में साफ झलक रहा है एकजुट आक्रोश
‘विनोद जी’ फिर से पीछे पड़ गए हैं बुलेटप्रुफ जैकेटों में दलाली खाने वाले,
देश की पीठ में छूरा भोंक मोर्चे पर जवानों को आगे करने वाले मतलबपरस्तों के
लग तो यही रहा है अपनी पोजीशन पर वापस लौट रहा है लोकतंत्र का चौथा खंभा
अब और क्या चाहिए!

अब छोड़िए गोली मारिये, भले ही कुछ प्रोड्यूसर अब भी इस मानसिकता वाले रह गए है जो मानते हैं कि ‘कब्रिस्तान में आतंकियों को दफनाने के लिए जमीन नहीं देने की खबर’ का वाइस ओवर कोई लड़की नहीं कर सकती, या लड़की की आवाज में ‘शहीदों की वीरगाथा’ का पैकेज अच्छा नहीं लगेगा.(लता जी, सुन रही है न, ये भूल गए कि आपकी आवाज में- ‘ऐ मेरे वतन के लोगों...” सुनकर नेहरु जी जैसे व्यावहारिक नेता की आंखों से आंसू छलक पड़े थे.) ऐसे लोगों पर तरस खाईए और आगे बढ़ जाईए, ऐसों वैसों की तो वो सोच भी खोखली साबित हुई कि ‘कि दर्शक अगर देश की चिंता वाली खबर देखता, तो अपने टीवी पर डीडी न्यूज चैनल फिक्स कर लेता. छोड़िए जाने दीजिए, टीआरपी की टांग पर चलने वाले ये लोग विचार के स्तर पर अल्पसंख्यक है, बिलकुल ‘बीजेपी के क्रियेटिव लीडर’ मुख्तार अब्बास नकवी की तरह, जिन्हें मोमबत्तियों की लौ के साथ गूंजती आवाज नहीं सुनाई देती, नीम रौशनी में भी नजर लिपिस्टिक पर चिपकती है. अगर हाथ मारें तो नकवी साहब रामू से कम बड़े फिल्ममेकर नहीं होंगे, जिन्हें खून से सने मातम में भी कोई ‘सीन’ दिखाई देता है.

बस इन्हीं चीजों की कमी खटक रही थी, अब जो लोग अपनी हदों से बाहर निकले है, एक दूसरे की चिंता के लिए दो पल का वक्त निकाल रहे हैं, अपने मतलब से बाइट देने वाले औरों की खातिर माइक पर रहे हैं, दुआ करो ऐ मेरे वतन के लोगों, कि अबकी जो आंख खुली है, ये जो नई रौशनी दिखी है, ये बुझने न पाए. बार बार नहीं आती ऐसी पॉजिटिविटी. इस चिराग को हमें मिल जुल कर उस मुकाम तक रौशन करना है, जब सारे चाराखोर,ताबूतखोर, कफनचोर, बंदूकबाज, कबूतरबाज आदि-आदि टाइप के ‘लोगों’ की औकात साफ साफ दिखने लग जाए. आखिर इन्हीं ‘त्रियम दर्जे’ के लोगों की खातिर चुनाव आयोग ने वोटरो को पप्पू तक कह डाला, आइए, इसी लौ में मिलकर कहते हैं-
“हमें पप्पू नहीं बनना ‘आयोग महोदय’, आपको शायद पप्पू का मतलब नहीं पता, पप्पू मर्दों के पायजामे के भीतर चड्ढी में दुबके किसी और ‘चीज’ को कहते हैं”

‘आयोग महोदय’ आपको पता भी है,पप्पू क्या से क्या कर सकता है? औकात पर आ जाए तो ‘चड्ढी’ फाड़ सकता है, अपनी खोल में समा जाए, तो फिर कोई परवाह नहीं, सरकार जाए तो जाए, जब आपको नहीं परवाह हर सीट पर दो चार दागी बिठाते हुए, झूठ बोलकर हलफनाफा थमाने वाले उम्मीदवारों को खड़ा करते हुए, तो आपके शब्दों में ‘पप्पू को खड़ा होने’ की क्या जरूरत?


‘खड़ा करने’ से पहले ‘ठप्पा मारने’ का विकल्प तो दो, पब्लिक इस बार यूं ही नहीं ठप्पा मारेगी

सोमवार, दिसंबर 01, 2008

लो, तुम्हें बेदखल किया...!


मुंबई में मौत का तांडव मचाने वाले
मायानगरी में दहशत फैलाने वाले
सरेआम बेकसूरों का खून बहाने वाले
तुम कैसे हो सकते हो अल्लाह के बंदे
तुम्हें अगर नफरत है इंसानियत के नाम से
तो हम तुम्हें बेदखल करते हैं इस्लाम से


ये फरमान है मुंबई के मुस्लिम काउंसिल ट्रस्ट का...आतंकियों के खिलाफ बेहद कड़ा रुख अख्तियार किया है ट्रस्ट के मेंबरान ने। मौलानाओं ने ऐलान किया है कि हंसते खेलते शहर में मौत का कहर बरपाने वाले आतंकियों को दफनाने की जगह नहीं दी जाएगी, क्योंकि कब्र में ऐसे काफिरों के लिए कोई जगह नहीं होती.

मुंबई में जो कुछ हुआ, आतंकियों की वजह से शहर दहशत के साये में रहा, इस पूरे वाकये से बेहद आहत है मुंबई का मुस्लिम समुदाय। आतंकियों के सफाये के बाद जब शहर में अमन कायम हुआ, ट्रस्ट ने एक आपात बैठक बुलाई, जिसमें मौलानाओं ने आम सहमति से मुंबई में मारे गए उन 9 आतंकियों को काफिर करार दे दिया, जिन्होंने पूरे 59 घंटे तक मुंबई को दहलाया, सरे राह चलते बेकसूरों का खून बहाया.

ट्रस्ट के अध्यक्ष इब्राहिम तई ने मीडिया के सामने ये फरमान जारी किया कि जिस मजहब में खड़ी हरी फसल को काटने की मनाही है, वो इस कदर जेहाद के नाम पर बेकसूरों का खून बहाते फिर रहे है, ये इंसानियत का कत्ल तो है ही, पैगम्बर मोहम्मद के उसूलों का भी खून है। ऐसे दहशतगर्दों को मुसलमान कहना इस्लाम का अपमान है.

मुस्लिम काउंसिल ने अपने इस फैसले की इत्तिला मुंबई पुलिस को दे दी है. आमतौर पर पुलिस मजहब के लिहाज से अपराधियों को भी मुंबई के बड़ा कब्रिस्तान में दफ्नाती आई थी, लेकिन इस बार ऐसा नहीं होगा. अब बोलो, कहां जाओगे दहशतगर्दों, तुम्हें तो दफ्न होने के लिए दो इंच जमीन भी नसीब नहीं होगी.

शैतानों, तुमने तो अपने करम से अपने वालिदों का वो हक भी छीन लिया, जो तुम्हें कंधा देकर कब्रिस्तान ले जाते, और तुम्हारी रूह के साथ अपने लिए भी दुआ करते-
सलाम हो तुम्हें ऐ कब्रवालों
अल्हाह मगफरत फरमाए हमारी और तुम्हारी
तुम हमसे पहले यहां आए
हम तुम्हारे पीछे आने वाले हैं!

शनिवार, नवंबर 29, 2008

सलाम है!

सपूतों,
नाज है तुम पर पूरे वतन को
गुमान है हमें तुम्हारे हुंकार पर
दुश्मनों का दिल दहला देने वाली धमक पर
तुम्हारे तड़तड़ाते कदमों की ताल पर
ये देखकर सुकून से भर जाता है जी
जब एक लय में बढ़ता है तुम्हारा काफिला
एक लिबास, एक मिशन
न कोई जाति, न कोई मजहब
निशाने पर होता है देश का दुश्मन
वो दहशतगर्द जो इंसान की शक्ल में
कम नहीं होता किसी हैवान से।

औरों के पीछे लग जाए मेरी भी दुआ
तुम्हारे फौलादी सीने को
पथ्थर से तुम्हारे इरादे को
चीते सी तु्म्हारी फूर्ती को
दुश्मनों का हौसला तोड़ देने वाले उस जज्बे को
जो तुम्हें परवाह नहीं करने देता अपनी जान की भी
उस मां को जिसकी गोद सूनी छोड़ तुम जुट जाते हो जंग में
उस पिता को जो
तुम्हारे पांव छूने के बदले करता है सैल्यूट- चुपके से!

सोमवार, नवंबर 10, 2008

शून्य का संवाद



शून्य किसे कहते हैं?
ये कोई वस्तु है या कोई पदार्थ
ठोस द्रव्य या वायु- हवा है पानी है क्या है ये शून्य?
ये किसका आकार है, किसका प्रकार है
क्या है ये नीले अंधेरे वाला स्याह मर्तबान।


दिखता तो है यही कि कोई देह नहीं इसकी
काया की छाया तक नहीं दिखाई देती, जब जिक्र में आता है शून्य
कोई आकार नहीं सूझता शून्य का, आभास भी नहीं होता इसकी परिधि का
फिर भी कैसे पसर जाता है पूरी फिजा में?
कैसे बेदखल कर देता है सुगबुगहाटों को
चुप कर देता है सरगोशियों को
समेट लेता है पूरी चहल पहल को

आखिर कितना विस्तृत हो सकता है एक निराकार का दामन
सुक्ष्म भी इतना है कि अंट जाता है दो शब्दों के नाममात्र अंतराल में
दो वाक्यों को विन्यास में
जुबान से टपकर ऐसे चिपक जाता है संवाद से कि मौन जाती है तमाम हरकतें
रुमानी स्पर्श की तरह नर्म हो जाते है तमाम ख्याल
जैसे उत्कर्ष के बाद शिथिल पड़ जाता है शरीर
आकार नहीं, प्रकार नहीं, देखने में साकार नहीं
फिर कैसा चमत्कार है शून्य?

इतना तो समझ नहीं पाते
फिर भी फिराक में रहते हैं चांद को हाथ लगाने की
अपना शून्य तो संभलता नहीं, औरों के शून्य पर राल टपकाते हैं

भरसक तांडव मचा रही है आदमी की जिंदगी में बाजार की मंदी!
रोज चौड़े होते जा रहे आसमान के छेद से उतर रहा है चांद का शून्य
उजास हो रहे हैं हमारे अपने आशियाने
विकराल होता जा रहा है देह और रूह का फासला

बेवजह नहीं, कि शून्य से अंट रही है, शून्य से बंट रही है
विचारों के ब्लैकहोल में गुम हो रही है खयालों की दुनिया

मंगलवार, अक्तूबर 21, 2008

अपनी उदासी तोड़ो वत्स!

खामोशी से खतरनाक है उदासी !
कई गुना ज्यादा खतरनाक
क्योंकि ये चुप्पी के हर उस सिरे को सिलती हुई अंदर दाखिल होती है
जहां से बोल फूटने की संभावना होती है.
खामोशी हमेशा एक उम्मीद से भरी हुई होती है
उपर से चुप, लेकिन अपने अंदर संवाद करती हुई.
हर एक्ट पर रियेक्ट करती हुई
बुलबुलों से भरी हुई एक जिंदा चीज है खामोशी.
फर्क करना सीखो वत्स!
उदासी वो वो सुई है जो समाते ही हर बुलबुले को शून्य बना डालती है.
निकाल देती है विचार के बुलबुलों की प्राण-वायु.
रोक लो वत्स, अपनी खामोशी को उस हद तक मत जाने दो
जो तुले हुए हैं तुम्हें उस हद तक ले जाने पर
उन्हें कामयाब मत होने दो
वर्ना वो ऐसा जश्न मनाएंगे
कि तुम्हारी खामोशी खुदकुशी करने को मजबूर होगी.


ये अधजगी नींद का वो सपना है, जिसकी आखिरी लाइन से मैं हिल गया. कुर्सी पर एक झटके में अलर्ट हो कर बैठ गया. आंखें भारी थी, लेकिन मैं जैसे पूरी तरह चैतन्य हो गया था.

नाइट ड्यूटी चल रही है. न्यूज रूम में घुसा तो सुबह के लिए कॉपियां तैयार थी. खबरों की लिस्ट थमा दी गई थीं, बस अब अपना काम शुरू करना था. अपने हिस्से की लिस्ट के साथ अपनी डेस्क पर बैठा मैं ऊंघने लगा था, स्टोरी किसके विजुअल से शुरू करें, मनसे के कार्यकर्ताओं की पिटाई में घायल बेचारे उत्तर भारतीय छात्रों के शॉट्स से, कि राज ठाकरे के आग उगलते भाषण से, कि सियासी बैठक से, कि राज ठाकरे की गिरफ्तारी की मांग के रुप में नेताओं की एक्टिंग से, कि गिरफ्तारी का ढोंग रच रही पुलिस से या, लालू नितिश और शरद टाइप उत्तर भारतीय नेताओं की प्रतिक्रिया से.
हर विजुअल का अपना मतलब है, जैसे सबकी अपनी सियासत का मतलब है.

ओपेनिंग विजुअल स्टोरी का हीरो होता है, और फार्मूले के मुताबिक वो हीरो ही होता है जो स्टोरी की शक्ल तय करता है. ऐसे में सवाल ये बड़ा अहम होता है कि अपनी स्टोरी का हीरो कौन हो, जो स्क्रिप्ट में ऐसा एक्शन कर दिखाए, जिससे कुछ तो ‘उखड़े’ लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता, खबर चल जाती है, लेकिन उखड़ना तो दूर बाल भी बांका नहीं होता. धमाके यूं ही रोज होते हैं, रो रोकर हम चाहें जितने ही जख्म गिना लें, दर्द भरी कहानियां सुना लें, आतंकियों का मन नहीं पिघलता. ‘पूरा देश एक है’ की दुहाई चाहे जितनी दे लें, राज ठाकरे आग लगाना बंद नहीं करता, उसके गुंडे हर बात में तोड़ फोड़ का बहाना निकालते हैं. जो लोग विरोध करते हैं, वो मीडिया को बाइट दे कर घर में घुस जाते हैं, कुछ दिनों गर्मा-गर्मी रहती है फिर जुट जाते हैं सियासत के लिए नया मसला गढ़ने में.

आजकल तो एल-18 से बढ़िया जगह क्या हो सकती है. सुनने से तो यही लगता है कि इन्हें कुछ पता नहीं, कोई सबूत हाथ में नहीं लेकिन जुबान पर एक ही नारा है- इनक्वायरी होनी चाहिए. हैरत तो इस बात पर होती है, कि ये वो लोग भी कह रहे हैं, जिनके हाथ में देश की बागडोर है, लेकिन सियासत के आगे उन्हें भी नहीं खयाल अपने शासन के मनोबल का, पुलिस के मोराल का. क्या होगा, जब बिना किसी आधार के यूं ही सवाल उठने लगेंगे. पुलिस को अथॉरिटी सरकार ने दी है, सरकार को तो कम से कम अपनी भाषा दुरूस्त रखनी चाहिए. लेकिन सियासत ने सरकार का भी बयान बदल दिया है, इस बात की परवाह किये बगैर कि इस तरह एक्शन की गारंटी अधर में लटक जाएगी.

हैरानी इस बात पर भी कम नहीं होती कि अमर भैया की भाषा में ऐसी बाइट वो लोग भी दे रहे हैं, जो राज ठाकरे को ‘मेंटल केस’ बताते हैं, राज ठाकरे के खिलाफ ‘देश बांटने’ का आरोप लगाते हैं, उसके खिलाफ ‘ताजिराते हिंद की सभी दफाओं’ के तहत कार्रवाई की मांग करते हैं. ‘पूरा देश सबके लिए खुला है’ का नारा बुलंद करते हैं, लेकिन अपनी बारी पर चिंता सिर्फ अपना वोट बैंक बनाने या बचाए रखने की खातिर दिखाते हैं, उन्हें जरा भी देर नहीं लगती देश पर मर मिटने वाले एक जवान की मौत पर सवाल उठाने में. जनता की मांग की आड़ में अपना ‘माइक्रोवेव ओवन’ (गौर कीजिए, रोटियां सेंकने वाले युग से कितना आगे बढ़ गए है हमारे छलिया) ऑन करने में.


एक्शन क्या खाक होगा. ये तो एक दिन की बात है, जो किसी को भी उदास कर देने के लिए काफी है. यहां तो रोज यही होता है. खबरों की लिस्ट मिलते ही नींद कई दिन, सच कहें तो कई हफ्तों आने लगी थी. शिफ्ट का एजेंडा तय होने के बाद ‘कोई फायदा नहीं’ के लक्षण वाला अवसाद घेर लेता था. ये खयाल जाने न चाहते हुए भी घर करने लगता था कि ‘साले कर क्या रहे हैं, और हम दिखा क्या रहे हैं, पेट साला, जाने क्या क्या कराएगा’ इसी ‘करना पड़ेगा’ की नियति और ’नहीं करूंगा’ की खोखली जिद की रस्साकशी में कुछ देर के लिए शून्य हो जाता है चेतन-अवचेतन. चेतना जगाए रखती है, तो अवचेतन नींद को निमंत्रित करती है. ठीक नीम बेहोशी वाली हालत पैदा करती है अधजगी नींद

शायद ये वही नींद है, जहां से खामोशी उदासी में बदलना शुरू करती है. हालांकि खामोशी अब भी जद्दोजहद करती है,लेकिन यहां पूरी संभावना रहती है उसके उदासी में बदल जाने की. और ये बहुत ही स्वाभाविक चीज है. विज्ञान भी कहता है कि जब तक किसी बल से ठोस, द्रव्य, या वायू के स्थान में परिवर्तन नहीं होता, उसे कार्य नहीं कहा जा सकता. यानी बिना बदलाव के आपका एक्शन पूरा नहीं होता. वो एक्शन किसी काम का नहीं, जिसका लौकिक असर न हो. खबरों की दुनिया में ऐसा हो तो कब से रहा है, लेकिन पिछले महीने भर की विडंबना अवसाद से ग्रस्त कर देने वाली है.
(शायद आपने भी नोट किया होगा, पिछले 28 सितंबर के बाद से मैंने किसी एक्शन पर रियेक्ट नहीं किया. उदास होने तक खामोश रहा)

लेकिन उस रात की अधजगी नींद का अधपका सपना मुझे नींद से झिंझोड़ गया. ऐसा लगा मेरी ही शक्ल का कोई देवदूत बंद आंखो के पीछे इंद्रधनुष बना रहा है. मास्टर जी जैसे ब्लैकबोर्ड पर हर वाक्य के साथ बोल कर समझाते हैं, वो देवदूत भी इंद्रधनुष में हर रंग की स्थापना के साथ कुछ कह रहा है, मुझसे संवाद कर रहा है, मेरी खामोशी को उदासी की नींद से जगा रहा है. वो मुझे सावधान कर रहा है.

रविवार, सितंबर 28, 2008

सुलगती हुई शाम के कोलाहल में...


शाम का पान बेहद रुहानी होता है, ढलती शाम के साथ चढते रंग वाला, यूं कहें कि टपकते हुए सूरज की लाली बंदे की जुबां पर पसर जाती है...और ये मौका जब फुरसत के दिन मिले तो जैसे बरसों की मुराद पूरी हो जाती है.
फुरसत के इस जिक्र से खयाल आता है, वो लम्हें तब कितने गर्मजोश हुआ करते थे, गुलजार का वो गीत उन चांदनी रातों में साकार हो उठता था-


जाड़ों की नर्म धूप और आंगन में लेटकर
आंखों पे खिंच कर तेरे दामन के साये को
औंधे पड़े रहे कभी करवट लिए हुए
बर्फिली सर्दियों में किसी भी पहाड़ पर
वादी में गूंजती हुई, खामोशियां सुने
आंखों में भींगे भींगे से लम्हें लिए हुए
बैठे रहे तस्व्वुर-ए-जाना किए हुए...

जी हां, दिल ढूंढता है फुरसत के वही रात दिन. यूं कहें कि पान एक निशानी है, ढलती शाम से बढ़ते उन चांदनी रात के इंतजार की. पगडंडी पर मुंह में पान चबाते, बाजार से अगली सुबह की मस्त उम्मीद में घर लौटते हुए...जब रात का सन्नाटा बढ़ता था, तो गांव का बेखौफ कोलाहल कानों में संगीत की तरह गूंजता था. धुली हुई चांदनी में नहाया हुआ कोलाहल...

पान उसी कोलाहल का साथी है, शाम का मन होता है, तो बुला लेती है आगोश में...फुरसत होती है, तो मैं भी गर्मजोशी दिखाता हूं...निकल पड़ता हूं...अब तो खैर पांवों में थकान होती है, जमाना ऐसा हो चला है कि अगले कदमों का भरोसा नहीं मिलता. उठेंगे या नहीं. लेकिन पान की खुशबू में बसा वो कोलाहल खींच ही लेता है- फुरसत के लम्हों को ढलती शाम की सरगर्म आगोश में...
पान की दुकान, ये हर मोहल्ले की वो जगह है जिसके खोखे पर पूरे मोहल्ले का नक्शा चस्पा होता है. पान की दुकान पर होने वाली चहल-पहल बता देती है कि मोहल्ला कितना खुशहाल है.

बम धमाकों की बात कहता हूं, आप मोहल्ले के पान की दुकान पर आते ही समझ जाते सोसायटी वालों की जेहनी हालत वैसी नहीं है, वो बस आते हैं, पैसे बढ़ाते हैं, और वैसे ही गुमसुम मुंह में पान दबाए, सिगरेट की डिबिया उठाये, मुंह लटकाए चल देते हैं. पानवाला भी लगता है, अपने आप में बिजी है, उसके चेहरे से साफ पता चलता है, उसके अंदर उधम मची हुई है- अपने ग्राहकों के उन संवादों का, जो दुकान से दस कदम दूर रहते हुए उसके कानों में गूंज उठते थे, आज उसमें धमाकों के बाद पसरा हुआ सन्नाटा सांय सांय कर रहा है.
कुछ सूझता नहीं बंधु, इसीलिए उन लहुलहान लम्हों में आपसे मुखातिब नहीं हुआ, क्या करें, जिसकी रूह जख्मों के तसव्वुर से ही कांप जाती हों, वो जख्मों को रोज जिंदा देखें, उसकी रुहानी हालत क्या होगी. कई बार सन्नाटा इतना घना हो जाता है कि वो शोर करने की बजाय शब्दहीन हो जाता है. वो फूट नहीं पाता, वो यूं ही घुटता रहता है. पता नहीं, उन दरिंदों की क्या नीयत है. इंसानी रिश्ते अब और धमाके नहीं झेल सकते...कितना झेलें, विश्वास की डोर कितनी देर अक्षत रहे, वो अमन के दुश्मन जान गए हैं, चोट कहां करना है- इन्हीं कमजोर नसों पर जो कमजोर पड़ गई हैं. उन्हें मजहब से क्या, दीन से क्या, धर्म से क्या, वो तो बस इंसान को इंसान नहीं रहने देना चाहते-एक दूसरे के लिए हैवान बना देना चाहते हैं. बिगाड़ देना चाहते हैं वो संतुलन जिससे दुनिया टिकी है.


इनके खिलाफ दुनिया का कोई हथियार काम नहीं आ सकता. क्योंकि ये हर वो जगह हैं, जहां आपका अंदेशा तक नहीं है. दांए सतर्क होते हो दो ये बाएं विस्फोट करते हैं. आप आगे सतर्क होते हो, तो ये पीछे वार करते हैं. ये दरअसल विचारों के लिजलिजे विषाणु हैं, जिसे सिर्फ आपकी इच्छाशक्ति ही मार सकती है, ये परमाणु बम से भी नहीं मर सकते लिजलिजे. आप बस ठान लीजिए, कि मुझे निजी तौर पर दहशतगर्दों का साथ नहीं देना, इनसे जुड़ी कोई सूचना कोई खबर नहीं छुपाना, इनसे कोई मोह नहीं रखना, ये किसी के नहीं होते है. हर आदमी अपने तमाम दुखों के बावजूद ये ठान ले तो, मुश्किल नही इन्हें मात देना. ये बेमौत मारे जाएंगे.

पान की दुकान से बात देखिए कितनी आगे बढ़ गई, अभी पान की दुकान पर मैं तो पहुंचा भी नहीं, लीजिए बस चंद कदम दूर है दुकान, मैं पान खाता तो हूं, लेकिन मीठा मसाले वाला. पान के बारे में एक बार बाबा ने कहा था, कि खैनी जर्दा सब तो खाते ही हो, तो खाओ, लेकिन पान के साथ मिलाकर इसका धर्म क्यों बिगाड़ते हो. अरे पान मुंह में जाएं, तो इसका मादक नशा पूरे तन बदन में छा जाना चाहिए, इतर गुलकंद, लॉन्ग इलायजी सौंफ, सुपारी ये सब एक साथ चीजें मुंह में जाएं, तो सोचो, क्या स्वर्ग का एहसास होगा.

जाते ही पान वाले ने टोका- आईए आईए भाई साहब, कहीं आउट स्टेशन चले गए थे क्या, दो तीन दिन बाद दर्शन हो रहे हैं...बोलिए क्या खाइएगा, वही 'सिंगल सींक'

मैंने टोका- क्यों, आज जल्दी में क्यों हो...

पानवाले की सांस लंबी होती चली गई-तीन दिन में बहुत कुछ बदल गया भाई साहब, अब कौन निकलता है घर से पान खाने, अब हम भी 9 बजे तक निकल जाते हैं, अब वो 12 बजे वाली मौज नहीं, लोग खाना खाकर टहलने निकलते थे, और हंसी खुशी मुंह में पान दबाकर जाते थे.

पानवाले की बात सुनकर लगा, किसी ने पान की पीठ में छूरा भोंक दिया है, और बूंद बूंद कर खून टपक रहा है. कुछ देर तक मैं इस बात पर खामोश रहा, लेकिन रहा नहीं गया-

'आप दुकान बंद करो भाई साहब, लेकिन ये अंत नहीं हैं, कम से कम उस कहानी का तो कतई नहीं, जो अभी आपने सुनाई...आदमी कैसे समा सकता है अपनी खाल के इतना भीतर, नहीं नहीं, ये अंत नहीं हो सकता. लोग निकलेंगे पान खाने, वो भी अब समझने लगेंगे, और ज्य़ादा भागे, तो ये अमन के दुश्मन हमारी खाल में घुसकर मारेंगे'
क्यों, गलत कह रहा हूं? नहीं, तो आईए, आप भी पान खाईए...!

मंगलवार, सितंबर 09, 2008

क्या विनोद जी, मरवा के ही दम लेंगे!

स्केच-जेनेवा का 'काला छेद'

'अरे सुनिए सुनिए, दफ्तर तो रोज जाना होता है, कभी हमसे भी दो चार हो लीजिए, आप लोग तो मरवा के ही दम लीजिएगा. काल को तो महाकाल बना ही दिए हैं आप, अब तो लगता है न हम बचेंगे, न कपाल. माजरा क्या है भैये, डेलिंग-पेलिंग के काम में मराते मराते तो वैसे भी थक चुके हैं, क्या वाकई मरने की बारी आ गई है, सच सच बताईएगा...ये देखो, डर के मारे पसीने तक नही छूट रहे...कहीं 'काले छेद' ने 24 घंटे पहले ही तो सोखना शुरू नहीं कर दिया ?'

माफ कीजिएगा, सोसाइटी का प्रॉपर्टी डीलर है, जब भी सामने पड़ जाता है, दुनिया जहान के मसलों पर ऐसे ही बात करता है, आप उसे चुंकि पहली बार सुन रहे हैं, इसलिए भद्दा लग रहा होगा, वर्ना उसे सुनकर तो यही लगता है- उसे हर 'चुतियापे' का पूरा पता है. और एक बार जो वो शुरू हो जाए तो आप उसे चलता नहीं कर सकते हैं, आपके गले में हाथ डालकर वो सब पूछ लेता है. मैंने भी सोचा, शर्ट क्या गंदा करवाना है, चलिय़े झेल ही लेते हैं...

''विनोद जी, वैसे तो साइंस हमने भी कम नहीं पढ़ा, बस एमएससी का फाइनल एक्जाम नहीं दिया, वर्ना हम भी कम विज्ञानबाज नहीं होते थे, लेकिन विज्ञान से ऐसा पाला कभी नहीं पड़ा. टीवी देखदेख कर अक्ल खराब हो गई है, सबसे पहले तो यही नहीं समझ में आता कि ये महामशीन जब 14 साल से बन रही थी, तो इस पर अभी क्यों हाय तौबा मचा. अगर प्रलय की तैयारी इतने दिनों से हो रही थी, तब...अच्छा...अच्छा, तब तो खैर 'आप लोगों' का जन्म भी नहीं हुआ था, लेकिन ये भी क्या खूब है, जनाब, पैदा होते ही आपलोग इतने बड़े हो गए कि नोबेल प्राइज विनर साइंटिस्ट्स को भी डंडा करने लगे.'

मेरे पास खींसे निपोरने के सिवा और कोई चारा बचता था क्या, आप ही बताइए...मैंने फिर भी ढीठई की- लेकिन उससे पहले ही एक सवाल और...
'विनोद जी आपको पता है, हमारे आसमान में कितने ब्लैक होल हैं, और कितने बड़े हैं, और हमारी धरती से सबसे नजदीकी ब्लैक होल कितनी दूर है? कल ही कही नेट पर सर्च मारा था, तो पाया कि 2600 प्रकाश वर्ष दूर है पृथ्वी के सबसे नजदीक वाला काला छेद, और साइज? साइज है सूर्य से हजार गुना बड़ा. और ये करोड़ो वर्षों से हैं, अगर आप लोगों की कसौटी पर ही कसें, तो इस धरती को कब का उस ब्लैक होल में समा जाना चाहिए था, लेकिन ये तो आज भी डोल रही है...'

'.... .... ...'
'आप लोग तो चार इंच के ब्लैक होल में पूरी दुनिया के समाने की बातें कर रहे हो. क्या आपने नहीं पढ़ा है- सूरज की उमर 5 करोड़ साल है, इसके बाद जब इसका ईंधन खत्म हो जाएगा, इसका आकार बढ़ेगा और ये बुझना शुरू होगा, लेकिन ब्लैक होल बनने की औकात इसमें भी नहीं, ये ज्यादा से ज्यादा सुपरनोवा बन सकता है, तो फिर 27 मील वाले इस लार्ज हेड्रोन कोलाइडर की क्या औकात? मान लीजिए, 10-10 फीट के एक हजार ब्लैक होल बन ही गए, और आपस में मिलकर बड़े भी हो गए, तो वो कितने बड़े हो जाएंगे कि दो सेकेंड में धरती, दो मिनट में चांद और 8 मिनट में सूर्य को निगल लेगा'

मैंने कहा- ऐसा होना तो नहीं चाहिए...

'तो फिर काहे गला फाड़ कर चिल्ला रहे हैं आप लोग, वैज्ञानिक बच्चे हैं क्या, अरे ठीक है, पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं, एक प्रोजेक्ट पर इतन खर्च कर रहे हैं, कि उसमें पूरी दुनिया की गरीबी मिट जाए, हर देश का इंफ्रास्ट्रक्चर दुरूस्त हो जाए, अव्वल तो ये, कि आप लोगों के खबर का एंगिल ये होना चाहिए. अच्छा मौका था, जब बहस शुरू होती, कि आखिर क्यों हम जाने धरती की पैदाइश का रहस्य, जब ग्लोबल वार्मिंग और दूसरी वजहों से इसका भविष्य ही खतरे में हैं. लेकिन आप लोगों ने फायदे तो एक नहीं बताए, लगे खिंचाई करने. अब समझ में आ रहा है- जब कॉपरनिकस ने कहा होगा- कि सूरज हमारी धरती की नहीं, हमारी धरती सूरज की परिक्रमा करती है, तब लोगों ने कैसा शो-ओपेन बनाया होगा, जब न्यूटन ने चीजों के ऊपर से नीचे गिरने का रहस्य बताया होगा, हमारे वजन का राज खोला होगा, तो मठाधीशों ने कैसा उत्पात मचाया होगा, बुरा मत मानियेगा- आप लोग कुछ वही कर रहे हो.

'वैसे, हम आपको बता दें, कि आज के लोग उतने चूतिये नहीं, जितने आप समझ रहे हैं, बड़ों की छोड़िए, बच्चे भी हंस रहे हैं...पता है आज ही की बात है, बेटे की डायरी जब चेक की, तो उसमें 11 को स्कूल में पेंटिग कंपटीशन का जिक्र था. मैने कहा- बेटा कलर और ड्राइंग पेपर चाहिए तो बोल दो, अच्छे से तैयारी करना...बेटा हंसने लगा. मुझे समझ में नहीं आया, फिर वो खुलखुलाते हुए बोला, छोड़ो पापा, 11 को हम बचेंगे ही नहीं, तो पेंटिंग कौन बनाएगा.'

हंसने को तो मैं भी उसके साथ जबरदस्ती हंस रहा था, लेकिन दरअसल में उससे पीछा छुड़ा रहा था. मैं अपनी भद्द और पिटवाना नहीं चाह रहा था. शुक्र है उसने भी पड़ोसी होने का फर्ज निभाया, मुझे बख्श दिया. लेकिन मुझे पता है, उसके सवाल अभी पूरे नहीं हुए, वो मुझे कभी भी दबोच सकता है.

बुधवार, सितंबर 03, 2008

'महुआ' का मतलब

आपने ठीक ही समझा है, मेरा इशारा एक उस नए चैनल की तरफ है, आज घर घर में दिख रहा है. लेकिन असल में ये चैनल तो एक बहाना है- ‘महुआ’ का मतलब समझने का. कोई भी ठीक ठीक नहीं कह सकता, इस ‘केबल एज’ में कितनों को पता होगा महुआ का मतलब. क्या है महुआ, आज अगर ये एक भाषा का बिम्ब बनने में कामयाब हुआ है तो इसकी विडंबना क्या है.

महुआ एक मटमैली भाषा का वो मुरझाया हुआ फल है, जो अपने ही रस में भस्म होने को मजबूर है. शहद जैसी होती है मिठास, तभी इसे मधु के समानांतर महु शब्द मिला, उत्पति के लिहाज से एक साउंड है. इस साउंड में एक पूरी संस्कृति का मादक शोरगुल छिपा है. मादकता महुआ का एक कैरेक्टर है, इसकी मिठास में गजब की मादकता है, वो मादकता जिससे एक पूरे मौसम की पहचान बनती है. वो मादकता, जिसकी वजह से फाल्गुन की मस्ती छाती है.

इस लिहाज से महुआ एक शुरूआत का बीज है. फाल्गुन महीने में जब पेड़ों पर नए पत्ते लगते हैं, महुए का पेड़ कोचियाता है, छोटे छोटे पीले फलों से पूरा पेड़ गदरा जाता है. ये फल दिन में कभी नहीं टपकता, पूरी रात ये मलय पर्वत की मादक हवाओं में अठखेलियां करता है, रंगरेलिया करता है, और सुहब ब्रह्म मुहूर्त में झड़ना शुरू होता है. सुबह सुबह आप महुए के पेड़ के नीचे आप जाईए, छोटे छोटे पीले फलों की बरसात हुई रहती है. नथुनों में दूर से ही इसकी धमक मिल जाती है, आज महुआ खूब ‘चूआ’ है.

फल इतने रसदार होते हैं कि छूने भर से रस टपकने लगे. इसे चुनने की जिम्मेदारी पारंपरिक रूप से दादियों और पोतों की रही है. दादी अपने पोते पोतियों को जगाती है और उनके नन्हे ङाथों में छोटी छोटी मौनियां (बुनी हुई डलिया) देकर निकल पड़ती है अपने दादा परदादा के लगाए हुए पेड़ के पास. बच्चे कूद कूद कर महुआ चुनते हैं. मोनियों का महुआ से भर जाना उनके लिए जिंदगी की पहली उपलब्धि होती है, सबसे पहले अपनी डलिया भरने की कोशिश में जिंदगी की पहली प्रतियोगिता से गुजरते हैं

देखते ही देखते खांचिया भर जाती है महुए के फलों से. घर ले जाकर दादियां महुआ को बड़ी जतन से धूप में सुखाती है, सूख जाने के बाद महुआ किसमिस की तरह हो जाता है. लेकिन महुआ की किस्मत किसमिस जैसी कहां.

दादी इसे संजोकर जरूर रखती है. कभी कभार इसके रेशे जैसे बीज साफकर दूध में फूलाकर कर छांछ बनाती है, कहती है इसके खाने जवानी लौट आती है. खासकर महिलाओं के लिए वरदान है महिला. बांझ औरतों के लिए महुए के पेड़ के गुदे (छिलके) को दूब की घास और कुछ दूसरी जड़ियों के साथ औंट कर (गाढ़ा उबाल कर) सीरप बनाती है. आपको जानकर हैरानी होगी इस काढ़े के सेवन से कई घरों में किलकारियां गूंज गईं. 35-40 साल की औरत का भी रूप ऐसे निखर जाता है, जैसे वो 20-22 की हो. इसका इस्तेमाल भैंसों के दाना पानी में भी होता है, जो भैंस 5-7 बरस की हो जाने पर बच्चे पैदा नहीं करती उसे आषाढ के महीने में महुआ खिलाने से कार्तिक महीने तक वो उम्मीद से हो जाती है.

लेकिन आज तक किसी ने महुआ को समझने की कोशिश नहीं की, इसके औषधिय गुणओं को परखने की कोशिश की गई, क्या पता ये पूरब का किसमिस हो बन जाता, हां देसी शराब का श्रोत जरूर बना दिया गया, क्योंकि इसकी मादकता पहनी नजर में ही नशे का एहसास कराती है. और एक बार महुआ नशे की कड़ाही में चढ़ा, तो फिर निठल्लों का साजो सामान बन गया, सभ्यता से कोसों दूर खिसकता गया, पढ़े लिखों को इसकी आमद से ही चिढ़ होने लगी...आज शायद ही किसी मध्यवर्गीय घर में आपको महुआ का दर्शन हो.

यहीं से महुआ बिम्ब बनता है उस पुरबिया भाषा का, जिसकी लय में मोहब्बत की मिठास है. जिसकी डिक्शनरी एक से एक मादक शब्दों से भरी पड़ी है, लेकिन उसका विकास ध्वनि से ज्यादा स्तर तक नहीं हुआ. महुआ की तरह भोजपुरी से भी वही खिलवाड़ हुआ. चेतना के होते हुए भी राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव औऱ इसके चलते बढ़ते निठल्लेपन ने भोजपुरी को निहत्था कर दिया, रंडियों की भाषा बन गई भोजपुरी, सीडी और वीसीडी कल्चर के साथ इसमें चोली और पेटीकोट के पीछे छिपे शब्द मुखर हो गए. भाषा के साथ जुड़े संस्कार और आदि भावनाएं गर्त में समाती गई और भोजपुरी एक अश्लील भाषा में तब्दील होती गई,

ये तो समस्या का एक सिरा है, इसके बाद बाद जब ग्लोबल कल्चर में पहचान की बात आई तो भाषा के साथ पूरे पुरबिया इलाके के सामने शर्मिंदगी की स्थिति सामने है. आधुनिक समाज में इसके अल्हढ़ टोन की हंसी उड़ाई जाने लगी. इसे बुड़बक समाज का प्रतीक करार दे दिया गया. कभी कोशिश ही नहीं हुई इस प्रतीक से मुक्ति दिलाने की. दिल में कसक सबके है, लेकिन एकजुटता की कमी हर कोशिश नाकाम कर गई

इस भाषा का पहला चैनल होने के नाते ‘महुआ’ स्वाभाविक तौर पर एक आस जगाता है, आस इसलिए, क्योंकि चेतना पर पड़ी राख अब चिंगारी के आगे हवा हो रही है, आंख खोलकर देखिए, अपनी भाषा में चीजें कितनी अच्छी लगती हैं, स्वाभाविक दिखती है. अब कोशिश ये होनी चाहिए कि ये चिंगारी ज्वाला बन जाए, नहीं तो ये आग अगर बुझ गई, तो फिर हमेशा हमेशा के लिए लुप्त हो जाएगा महुआ का संस्कार.

सोमवार, सितंबर 01, 2008

टीज मी, डोंट टीज मी, डोंट टीज मी शोणिए...

बेचारा शनि आजकल फिल्मी गीत गा रहा है- बिलकुल कैट्स के स्टाइल में. इस खुशी में नहीं कि छोटे परदे पर इस छल्लेदार ग्रह को कोई इंसानी शक्ल मिल गई है, बल्कि बेचारा दर्द में कराह रहा है.

अब कराहने का संबंध इतनी प्यार भरी भाषा से कैसे हो सकता है, आप यही सोच रहे होंगे कि जितनी जानी पहचानी है, उतनी ही मीठी लाइन है- ‘टीज नहीं करने’ के आग्रह से ही साफ पता चलता है. तो इसका किसी के दर्द के वास्ता...

अब भाषा की परिभाषा के मुताबिक तो यही मतलब निकलता है कि जब खुददरे शब्द बहुत दिन तक घिसते हैं, भाषा के साथ भावनाओं की चक्की में पिसते हैं तो चिकने हो जाते हैं. इस सिद्धांत के मुताबिक अब जरा सोचिए कि शनि की भाषा इतनी चिकनी हो गई है, तो पहले खुरदरी कितनी होगी. वो क्या कहता होगा और किस अंदाज में कहता होगा.

बेचारा बहुत दिन से चिल्ला रहा था, गला फाड़कर गरज रहा था- अरे मेरे बाप की औलादों, क्या मजाक कर रहे हो मेरे साथ, क्यों इस काली कलूटी जान की लेनी किए हुए हो, बख्श दो मेरे बाप की सौतेली औलादों, क्यों दिन रात अंगुली करने पर तुले हुए हो, बाज आओ मेरे जीजा के सालों, क्यों मेरी इज्जत से खेल रहे हो, मैं तो खुद ही अपनी इज्जत बचाता फिर रहा हूं, मैं तुम्हारा क्या उखाड़ सकता हूं.

मैं विनाशी नहीं, मैं सर्वनाशी नहीं, मैं उत्पाती नहीं, लाखों मील दूर मेरी ढेले भर की औकात नहीं, मैं तो ससुरे सूरज का खुद ही शिकार हूं, रौशनी के बिना लंबे दिन रातों और युग जैसे वर्षों में कलपते रहता हूं. मैं तो ठीक से बोल पाने में अक्षम हूं, मैं क्या न्याय करूंगा, दौलत बरसाना तो छोडो, मैं तो पसीना बहाने के भी कंडीशन में नहीं हूं

क्यों निकाल रहे हो, मेरे आंख नाक कान दांत, मुझे क्यों बना रहे हो विलन. मेरे छल्ले की कसम, ‘जान’वरों, बस भी करो, पीछे दर्द होने लगा है, तुम्हारी उंगलियों की आवाजाही से, लहुलूहान हो गया है पूरा का पूरा...

बेचारा शनि, एक साल में ऐसी हालत हो गई कि घिसते घिसते उसकी भाषा में दर्द पैदा हो गया, शायर की तरह तड़प पैदा हो गई, लेकिन उसे क्या मालूम था उसकी तड़प इतनी बिकेगी, जितनी बिकेगी उतनी उंगलियां उसकी तरफ और बढ़ेंगीं. और वो चाहे किसी का सत्यानाश करे या नहीं, उसका सत्यानाश जरूर हो जाएगा. भाइलोगों ने पूरा प्लान बनाकर बांस किया, एक ही टाइम स्लॉट पर अलग अलग बांस से बांस किया, बांस करने का बहाना चाहिए, पहले तो दिन के उजाले में करते थे, काली घनी रात में उससे भी ज्यादा करते हैं. प्राइम टाइम में फाड़कर रख देते हैं. ससुरी झूठ होती है महानगरों की अमावस, अंधेरे में भी इज्जत नहीं बचती.

अब बताइए भला, अमावस में शनि की क्या गलती, ये तो सूरज चंद्रमा और धरती का खेल है, इनकी लुका छिपी का खेल है, इससे शनि का क्या लेना देना, लेकिन नहीं, भाइयों ने फिर भी बांस किया, बेचारे को बिना वजह विलेन बना दिया. वो बेचारा तो खुद ही कनफर्म कर रहा है कि वो देवता नहीं, लेकिन एक बार बेटा बहुरिया घर से निकल गई, तो फिर समझो कि या तो बहुरिया जाने या फिर ऊपरवाला. इसी तरह शनि भी ऊंगली वालों को मजा दे गया तो दे गया, अब फिर कहां बचना,

बेचारा थक हार कर शनि जमीन पर लेट गया, लो भाइयों, जितनी मारनी है मार लो, अब तो आह भी नहीं किया जाता. फिर बेचारे को अकल आई, अरे यार, इनसे संपर्क साधने के लिए इन्हीं की भाषा में बोलना पड़ेगा, बिलकुल इन्हीं लटके झटकों में...

अगले ही दिन से शनि की भाषा बदल गई, चाल में कैटरीना सी लचक पैदा हो गई, और करीना सा उसका दिल डांस मारने लगा- टिज मी, डोंट टिज मी, डोंट टिज मी शोणिए...चालाक हसीना की तरह शरारत पर उतर आया है शनि,

अब देखना है इस अदा पर कितने दिन तक बचता है शनि...

शनिवार, अगस्त 09, 2008

सुन लो 8 से डरने वालों


बात ऐसी भी नहीं, कि उसका जिक्र किया जाए, लेकिन बात वैसी भी नहीं, कि 'विचार ग्रंथि' को टच किए बगैर निकल जाएं.बड़े शहरों की खासियत है, छोटी छोटी बातें यहां भी बड़ी रेफरेंस वाली होती हैं.
एक वाकया देखिए- सावन की काली घटा से मस्त हो रखा है मौसम. दफ्तर से थोड़ी जल्दी छुट्टी हुई तो लगा, कितना अच्छा सौभाग्य है. हालांकि सड़क पर जाम ही जाम था, लेकिन पानी उतर चुका था, कीचड़ धुल चुके थे, शहर ऑटोमेटिकली साफ दिख रहा था. मार्केट से गुजरते हुए हलवाई की दुकानों से आ रही सोंधी खुशबू नथुनों में चढ़ रही थी..

घर से पांच मिनट की दूरी पे होउंगा, तो फोन आया, पत्नी बोली-
'क्या बात है, आज फोन नहीं किया, बारिश में गरम पकौड़े नहीं खाने क्या...कब आ रहे हो?
'नहीं, आज पकौड़े के साथ जलेबी खाने का मन है...बोलो खाना है क्या, पकौड़े तुम्हारे, जलेबी मेरी...
पत्नी को मजाक सूझा, जैसे जलेबी को मिठाई नहीं, लड़की हो-
'ये जलेबी आपकी कहां से हो गई...कि उसके नाम पर आपकी जुबान इतनी गीली हो रही है...
''पता नहीं, आज क्या हो रहा है यार, जलेबी ही नहीं, पूरी दुनिया ही अपनी लग रही है...
''...अच्छा...!, तब तो जलेबी को घर लेते ही आईए, दुनिया की भीड़ से जलेबी ही अच्छी है, मैं पकौड़े बना रही हूं...'
गाड़ी रोक कर मैं दुकान के पास गया, अब नाम मत पूछिए, कि वो दूकान अग्रवाल स्वीट की थी, या कोई ठेले वाला, आप सिर्फ जलेबी पर कॉन्सेनट्रेट कीजिए...
हां, तो मैं जलेबी की दुकान का जिक्र कर रहा था, वहां पहुंचा तो देखा, अभी तैयारी जल रही है, चूल्हा जला चुका है, लेकिन काम अभी शुरू नहीं हुआ. मैने पूछा- कितनी देर लगेगी भैया...?हलवाई भी जल्दी में था, बोला- बस सर, तेल गरम हो रहा है...10 मिनट में तैयार होगी
मैं हाथ बांधे चुप चाप कड़ाही पूरी तरह गरम होने का इंतजार करने लगा...पांच मिनट में तेल गर्म हो गया, और काम शुरू...मैं उसकी सफाई का सेंस, उसका चीजों के प्रति कंसर्न, और आगे होने वाले कामों की प्री-प्लानिंग देखकर दंग था- अच्चा लग रहा था उसकी सटीक सक्रियता देख कर।हलवाई ने आंख बंद कर पहली जलेबी कड़ाही में डाली...उसे अच्छी तरह लाल कर पकाना शुरू किया...
ये कोई नई बात नहीं थी, मेरे लिए, बहुत पहले भी मां जब रोटियां बनाती थी, तो पहले छोटी रोटी बनाती थी, तवे पर डालकर उसे अच्छी तरह पकाती थी, और उसे किसी को खाने नहीं देती थी, वो सुबह गाय को खिला देती थी...

जब जलेबी पूरी तरह लाल हो गई, तो हलवाई ने उसे कडाही से निकाला, और चूल्हे की आग में उसे रख दिया...जलेबी धू धू कर जलने लगी, फिर उसने हाथ में पानी लेकर उसपर आचमन मारा और "गोड़ लागा* और काम में नए सिरे से जुट गया...

एक दो तीन या चार 8 क्या उसने जलेबी की शक्ल में कई 8 बना डाले, पूरी कड़ाही 8 की शक्ल से भर गई. लेकिन....गौर फरमाईए बंधु,

गजब का विश्वास है बंधु, गजब का भरोसा- कि अग्नि को पहला निवाला देने के बाद आगे जो भी होगा खैरियत के लिए होगा...शनि कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा. टीवी पर 8 के अंधविश्वास का मारा मैं हलवाई के विश्वास से जाने क्यों राहत महसूस कर रहा था...

हलवाई के चेहरे पर गजब का सुकून था. मैने तय कर लिया, ये बात पत्नी से जरूर बताऊंगा

* 'गोड़ लागना' भोजपुरी की एक क्रिया है, जिसका हिंदी में मतलब होता है- गोड़ यानी पांव, लागना मतलब छूना- पांव छूना...। इस क्रिया से जुड़ा एक वाकया आपको जरूर बताना चाहूंगा- किस्सा गांव का है. एक गुरू जी थे, बिलकुल फिक्स टाइम पर रोज सायकिल से स्कूल जाते थे, बारहो मास नहा धोकर, टीका लगा कर और गेरुआ चोंगा पहन कर. उनकी सायकिल के बारे में मशहूर था- ये आवाज नहीं करती. गुरूजी उसे मैंटेन ही इतना करते थे. खैर, किस्सा ये है कि लोग उनको चिढ़ाते थे. उनको खास तौर पर चिढ थी, अपभ्रंस भोजपुरी के शब्दों से. वो चाहते थे कि पढ़े लिखों की बोली में ठेठ भाषा का इस्तेमाल अच्चा नहीं लगता. एक तरफ तो आप हिंदी में बात करते हो, और जहां अटकते हो, वहां ठेठ शब्दों का सहारा लेते हो. और जब तक ऐसा बंद नहीं करोगे, तब तक आप शुद्ध हिंदी नहीं सिखोगे. क्योंकि भोजपुरी हिंदी परिवार की भाषा है. इसलिए मिक्स अप से बचना चाहिए. लेकिन लोग उनकी इस दलील से सहमत नहीं थे, क्योंकि वो इस बात पर मौके के हिसाब से बड़ी बुरी तरह झिडकते थे. लोग उनसे डरते तो जरूर थे, क्योंकि वो विद्धान और रौबदार थे, लेकिन चिढ़ाते भी खूब थे. खासकर बच्चे, जो उन्हें 'गोड़ लाग तानी गुरूजी...' कह कर भाग जाते थे,एक दिन लड़को के झूंड ने इसी अंदाज में अभिवादन किया- गोड़ लागअ तानीजा गुरू जी...(सबने एक स्वर में कहा)इतनी सारे लड़को और पीछे आ रहे लड़कों के दूसरे झूंड को देखकर गुरू जी के पास चुप रहने के सिवा कोई चारा नहीं था. लेकिन गुस्सा तो उनके अंदर छटपटा रहा था...सायकिल रोककर उसे शांत करने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन नहीं रहा, निकल ही पड़ा..-गोड़ लागला तक त ठीक बा, लेकिन एक बात बताव जा, हाथे कहिया लगबअ जा...गुरू जी के जवाब के बाद लड़कों के पास मुंह बंद कर हंसने के सिवा कोई चारा नहीं था.

मंगलवार, अगस्त 05, 2008

एक बार फिर मरी आरुषि!


एक बार फिर से पूछ रहे हैं बच्चे- क्या हुआ आरुषि का, पापा...?
इशारा तो आप समझ ही गए होंगे, बच्चे क्यों पूछ रहे हैं ये सवाल. लेकिन बड़े क्या जवाब दें- एक बार फिर क्यों मरी आरुषि, ये तो गहरी विवेचना का विषय है कि दोबारा क्यों मार दी गई आरुषि, लेकिन एक सवाल का जवाब मिलते ही माजरा कुछ हद तक साफ हो जाता है- कैसे दोबारा मरी आरुषि- आप सबने देखा- एक बार उसे आसमान पर उठाया, देर तक झुलाया...और फिर अचानक, आसमान से पटक दिया. पटका भी ऐसा कि हकीकत के धरातल पर उसकी खबर क्या, सरगर्मी तक नहीं बाकी.

जब दिखाया/छपा तो क्या खूब दिखाया/छापा, जो नहीं दिखाना/छापना था वो भी दिखाया/छापा. हर खबर के साथ बेचारी को नई मौत के साथ मारा. अंधेरे में तीर मार मार कर कई सारी थ्योरियां निकाली, लेकिन सब गुड़ गोबर...सब सड़ी हुई. चैनलों को टीआरपी अच्छी हासिल हुई, तो अखबारों को, खासकर दिल्ली के दो टेबलायड्स का सर्कुलेशन 'हाइट' पर पहुंच गया, लोग सच जानना चाहते थे, इसलिए देखते/पढ़ते थे- आरुषि को वाकई किसने मारा, क्या हुआ था उस रात उसके साथ, लेकिन ये सवाल आज तक अधर में है, अब जबकि आरुषि की आत्मा को मीडिया की सबसे ज्यादा जरुरत है, उसे नहीं लगता आरुषि के इंसाफ से कोई वास्ता रह गया है. .

लगता तो यही है, सारे मसाले चूस चुके मीडिया वाले- मर्डर, मिस्ट्री, सेक्स,एक्सट्रा-मेरिटल अफेयर, रेप... आपको याद होगी- मासूम के निहायत ही निजी मैसेज को भी क्या मिर्च मसाला लगाकर परोसा, ऐसी थी आरुषि, वैसी थी आरुषि...बकायदा री-क्रियेशन कर दिखाया गया, ऐसे हुआ कत्ल, ऐसे हुआ रेप...एक अभियान छेड़ रखा था, लेकिन अब क्या...?

अब तो सीएफएसएल से तमाम रिपोर्ट भी आ गई होगी, सीबीआई के तमाम दावों की सच्चाई सामने आ चुकी होगी, उसने किन सबूतों और किस बिना पर किसको बरी किया, किसको गुनहगार ठहराया, कैसे उन्हें कोर्ट में दोषी ठहराएगी, दो महीने तक आखिर उसने क्या किया. ये सारे सवाल अहम है. लेकिन इसका जिक्र न तो सिंगल कॉलम/न टिकर कहीं नहीं हैं. जाने उस मासूम के सहारे समाज का कौन सा सच दिखाना चाहता था मीडिया, जिसके पर्दाफाश से पहले ही उसने चुप्पी साध ली. जेल से छूटने के बाद पिता सुकून से घर में बैठे हैं, सीबीआई सुस्ता रही है, और आरोपी (कृष्णा, राजकुमार, और विजय) जेल में अपने निर्दोष होने का राग अलाप रहे हैं. कहानी अभी खत्म नहीं हुई है,

माफ कीजिएगा, मैं भी अपनी बात कुछ सवालों के साथ ही खत्म कर रहा हूं- जवाब मेरे पास नहीं, एक अपील जरूर है- एक बार फिर पीछे पड़ो बंधुओं, टीआरपी नहीं, इस बार आरुषि के इंसाफ के लिए- दिन में 10 मिनट के लिए ही सही. आपकी चुप्पी की वजह से आरुषि के गुनहागार सुकून की सांस ले रहे हैं

इतना तो हक बनता ही है- उस दुलारी का, जो खबरों की जान बन गई थी.

मंगलवार, जुलाई 29, 2008

पत्नी का पंच-२ (बताइए, अब क्या जवाब दें?)

बहुत दिन बाद मिला ‘पत्नी का पंच’
मिला भी तो `मिला कि जवाब ढूंढने पर भी नहीं मिला...
वो हुआ यूं कि दफ्तर से लौटा तो घर के मेन दरवाजे के बाहर बालकनी का सीन बदला बदला दिखा. हैरानी तो नहीं, इसे सुखद आश्चर्य ही कहूंगा- पत्नी का हरा भरा गुट देखकर अच्छा लगा.
पत्नी के साथ तीन और औरते अपनी अपनी कुर्सियां बरामदे में सेंटर टेबल के इर्द-गिर्द टिका कर बैठी हुई हैं...चाय और मठरी के साथ मजे ले रही हैं...खिलखिला रही हैं, ठहाके लगा रही है...देख कर लगा कि हां, शहर में दोस्ती इसी तरह बेलाग होनी चाहिए. अंदर की लाग भले ही न हो, बाहर का लाग इतना तो हो ही, कि जब मिलें तो वक्त कट जाएं...

खैर स्टोरी ये नहीं है, स्टोरी ये हैं कि मैं अपना सुखद आश्चर्य जताए बिना सपाट भाव से उन्हें देखते हुए सीढ़ियां चढता रहा. उन्होंने आहट पाकर मेरी तरफ देखा और थोड़ी झिझक के साथ सबका वॉल्यूम कम हुआ...जो कि फ्रैंकली स्पीकिंग- मुझे अच्छा नहीं लगा...फिर भी उनकी झिझक पर हल्की मुस्कान बिखेरता मैं अदर चला गया, मैंने देखा पत्नी का आने का मन था, मगर दोस्तों को पति के आगे छोटा कैसे कर दे, पति तो परमानेंट है, उनकी ज्यादा चिंता क्या करनी... वो दुविधा भरी मुस्कान के साथ मुझे देखती रही.

जो भी हो, मैं पत्नी की इस सोच से शत प्रतिशत सहमत हूं. प्यार हो न हो, बढ़ती उम्र में एक दूसरे की चिंता ठीक ठाक हो जाती है. इसे आप जवानी के प्यार से कम नहीं समझ सकते.

खैर स्टोरी ये भी नहीं है
स्टोरी है कि पांच मिनट के भीतर कोई बहाना बनाकर दोस्तों से छुटकारा पा गई, आते ही नींबू पानी बनाया और अगले ही पल रोज के मुड में...
‘क्या बात है, आज बुझे बुझे नहीं दिख रहे, आज खुद गाड़ी चलाकर नहीं आ रहे हो क्या...
बड़े खिल रहे हो...
मेरा चेहरा बुझा हुआ वाकई नहीं था
‘कहां यार, ये बुझन भी अजीब चीज है, होती तो रोज है, लेकिन कभी दिखती है कभी नहीं दिखती...’

फिर मैंने इश्यू बदला
आज तुम लोग बहुत ‘गिल’(भोजपुरी में हंसी का ठिकाना न रहना)दिख रही थी...अच्छा अच्छा है...देखकर हमें अच्छा लगा...अब तुम्हारा भी अच्छा वक्त कट जाता होगा...’
‘कहां जी, कहां कटता है वक्त...नहीं कटता है घर में, तभी बरामदे में बैठ जाते हैं...अब बैठते बैठते काफी मिलना जुलना हो गया है...50-60 का खर्चा भी बढ़ गया है। ह..हा...हा...अच्छा है, ना जी,’
मुझे वाकई अच्छा लगा पत्नी को खुश देखकर...

अब देखिए असली स्टोरी...
सुस्ताने जा ही रहा था कि तकिए के सहारे चाय लेकर मेरे ही सोफे पर बैठ गई...मुझे लग गया अब टीवी चर्चा शुरू होगी। सवाल कितने गंभीर होते हैं, ये तो आप लोग पिछले पंच में ही देख चुके हैं। यही तो खूबी है, पत्नी पंच भी मारती भी है, तो प्यार से..
पूछा-
अच्छा एक बात बताओ...अभी हम सब औरत लोग यही बात कर रहे थे...ये टीवी वाले और कितने नीचे गिरेंगे यार...दिन ब दिन भरोसा घटता जा रहा है...कह रही थीं-
-आज तो हद ही हो गई...दिन भर धमाके ही गिनते रहे...
-अरे तब तो हद ही हो गई, जब धमाके गिनाना बंद किया और फिल्मी ब्रेक पर लंच करने गए तब तो हद ही कर दी-एक चैनल पर आ रहा था, कि सलमान से कटरीना की कुट्टी हो गई, उसी वक्त, ठीक उसी वक्त एक चैनल पर आ रहा था-ये कैट सल्लू की ही है...हाथों में हाथ डाले कटरीना और सलमान टीवी की भाषा में कह रहे थे- हम साथ साथ हैं...

‘अच्छा तुम ही बताओ, ये बकवास नहीं है तो क्या...हम कैसे मान लें कौन सी खबर अच्छी थी, और कौन सी खबर- ऐंवी है...’
सच कहूं तो मेरे लिए भी बीबी की ये खबर किसी ब्रेकिंग न्यूज से कम नही थी- ये क्या चुतियापा है यार...खैर मैने जाहिर नहीं होने दिया
‘मैने कहा- अपना अपना सोर्स है यार...होता है...’
‘क्या खाक होता है यार, अब टीवी का कोर्स नहीं किया लेकिन इतना तो लगता है कि इसमें सोर्स नहीं अप्रोच का फर्क है. बिना कन्फर्म किए तुम कोई खबर दिखा कैसे सकते हो यार...’

मैने कहा-‘अरे, तो क्या हो गया सलमान कटरीना की खबर से कौन सा देशहित का नुकसान हो गया...हैं..’
‘अब देशहित का आप लोग न कहो यार, टीआरपी के आगे आपलोगों को कुछ दिखता है?, इतना बडा धमाका हुआ है- कोई मुहिम, कोई एक्शन है आप लोगों के पास...कुछ नहीं है- सिर्फ धमाकों की गिनती के सिवा....लोगों लेकिन सच कहूं- टीआरपी अब तुम्हारे लिए जल्दी भ्रम साबित होने वाली है.
मैने मन ही मन कहा- कैसे?
‘तुम लोग क्या समझते हो, सलमान कटरीना हमें अच्छे लगते हैं, इनकी वजह से हम टीवी देखते हैं, तो क्या इनसे जुड़ी कोई भी सड़ी गली खबर देखते रहेंगे...उबन हो रही है जनाब...आज हम इसी पर बात कर रहे थे...’
मैने फिर बेशर्मी की- मजे लो यार, कटरीना जलने कटने की चीज नहीं, और कुछ नहीं तो सलमान के लिए देखो यार, क्या बॉडी है भाई की...
अब बीवी कुछ हल्की नजर आ रही थी
‘वही तो मैं सोचती हूं यार, कितना क्यूट कपल है, काहे के लिए आलतू फालतू की चीज कहते हो बेचारों के बारे में...बेचारों ने आज तक खुद नहीं कहा- प्यार है या नहीं, है तो कितना, नहीं है तो क्यो...लेकिन तुम लोग बिना बाइट-वाइट के लगे रहते हो. अगर यही लगता है कि सल्लू कैट की टीआरपी है, तो यही दिखाओ यार कि दोनों में कितना प्यार है...कब कहां मिले, कैसे मिले, कैसे एक दूसरे के साथ है- क्या फीलिंग है, क्या जोड़ी है...मैं दावे के साथ कहती हूं- दुनिया तो चिपक कर देखेगी...

अब आप ही बताइए, मैं क्या जवाब देता...(अव्वल तो ये कि क्या मेरी जवाब देने की औकात है?)
मैं भूंजे चबाते हुए अपनी लाज पचा रहा था, लेकिन चेहरे पर पसीना नहीं आने दे रहा था. बस चुप था, पत्नी समझ गई कि बेचारा हार मान लिया है-दिल से...सो उसने टॉपिक चेंज कर दिया...

‘और बताओ, ये सब छोड़ो, ये हम दर्शकों का काम है...और कैसा रहा आज का दिन...बाकी सब ठीक रहा...’
अपनी बाजी देख अब मैं दार्शनिक हो रहा था...
‘अब क्या बाकी और क्या ठीक यार...जो ठीक होता है वही बाकी होता है...’
पत्नी चकरा गई, माथा पीटकर कहा- मतलब....?
‘हां, ठीक ही कह रहा हूं- जो ठीक होता है वही बाकी होता है....जो भी अच्छा होता है, वो ऐक्चुअली होता कहा हैं...वो तो बाकी ही रहता है न...’
‘……. …….’
‘मतलब, जो बाकी नहीं होता, वो टीक भी नहीं रहता, नहीं समझी...’
‘अरे बाबा समझ गई, इतनी भी बुद्धू नहीं हूं, तुम लोग टीवी वाले आदत से बाज नहीं आओगे, घुमा फिर कर खबर क्या साधारण सी बात की भी चक्करघिन्नी बनाए रखोगे...अब देखो, बाकी और ठीक दोनों ही अलग स्वतंत्र शब्द हैं, लेकिन अलंकार के फेविकोल से ऐसे चिपका रहे हो दोनों को, कि सही सही मतलब का ठिकाना बदल रहा है. चलो, तुम्हारा दर्द समझती हूं, लेकिन पत्नि के सामने इतनी कठिन भाषा में दुखी होने की क्या जरूरत...
कम ऑन यार...’
दुआ कीजिए, ऐसा प्यारा पंच हमेशा मिलता रहे!

रविवार, जुलाई 27, 2008

अब तो संभलिए जनाब...

एंकर छोटा...रिपोर्टर छोटा, कमेंटेटर छोटा, प्रेजेंटर छोटा और तो और स्टूडियो का मेहमान भी हो गया है छोटा...

इन सबसे बड़ा हो गया है- विजुअल का विंडो। यही तो आतंकियों की साजिश थी- जितना बड़ा धमाका, उतना बड़ा विंडो, देखिए, किस तरह कामयाब हुए हैं आतंकियों के मंसूबे...

माफ कीजिएगा, एक दर्शक का दर्द बयां कर रहा हूं। हमारे अपने ही चैनल हमको कितना बड़ा चूतिया समझते हैं. समंदर पार बाल भी उखड़ता है तो दिन रात लाइव ताने रहते हैं. यहां एक के बाद एक शहर धधक रहे हैं, समंदर पार वाले चैनलों को सिर्फ अपनी पड़ी है.

जब बैंगलुरू में बम फटे तब भी, जब अहमदाबाद की आह से पूरा देश दहल गया तब भी. सीएनएन वाले, बीबीसी वाले तब या तो अपनी मौज में थे, या बस दिखाने की खानापूर्ति कर रहे थे.
हम वाकई चूतिये हैं। समंदर पार वालों से दोस्ती के लिए अपने संबंध खट्टे कर रहे हैं. कोई सरकार गिराने के लिए तो कोई सरकार बचाने के लिए मां बहन एक कराने को तैयार है

अब तो संभलिए जनाब

सोमवार, जुलाई 21, 2008

आपके बहाने अपना बयान

Sabse pehle to sorry, likne baitha to Hindi font hi nahi tha, so thoda kast kijiye, English me hindi likhne ka paap jaldi hi hata loonga…

Ajeeb Ghalmel hai, paristhitiyon ka, smritiyon ka, fursat me vicharon ki udham itni hoti hai ki lamha lamha judkar ek fasana sa ban jaata hai. Aisa fasana, jisme dil ka dard aur jamane ke ranjo gham ek doosare ko gale lagate hai, mohalat hoti to ek doosare me sama zaate, lekin fursat ki ghadi hi kitni hoti hai? Saamne ambar laga hota ‘kahin ke rode, kahin ki yaado ka…

Lekin…

Dil itna bechara sa hota hai, ki mamooli si baat par bhi puchhta hai, kyon accha lagta hai, jab bachche kahte hain- Happy Bidday Papaaa…Aur aakar seene me sama jaate hai, Aapke zinda hone ka ahsaas kara dete hai, Aap unke saath phir se paida hote hai, jab beti maa ki tarha maathe par tilak lagati hai, aarati utarti hai, maa ki tarha papa ki lambi umar mangati hai, Uparwale ko thank you kehti hai- is meharbaani ke liye।

Are bhai, isme puchne ki kya baat hai, ye to achchi lagni hi chahiye. Isse achchi baat kya ho sakti hai. Beti ashwast hoti hai to lagta hai ki apka vishwash ‘talwar’ ki dhaar par nahin tika.
Itni khushi, saaftor par pakdi jaati hai- kal to chehre par muskan ke nishan tak nahi the, aaj gham ki ek shikan tak nahi, aapki udaasi nangi ho jaati hai. Doosara toke to aap bhale use nakar dein, hans kar taal jayen, sach yahee hai- aap pakde jaa chuke hai.

Sirf apne hi ghar me hi nahi, ishwar ke ghar bhi, kal bhi wahi patthar ki murat thi mandir me, aaj bhi wohi hai, lekin aaj aap ishwar se jyada ki umeed kar rahe hote hai, uske agyat taakat ki kalpna kar rahe hote hai, aap dhan daulat nahi, andar aur baahar ki shanty mang rahe hote hain- kyonki aap thak chuke hote hai।

Isi ka naam to ishwar-allah-god-guru hai। Main bhi manta hoon ki ek pathar, ek ibaarat me rakha kuch nahi- agar nahi maano, ishwar-allah-god-guru iska naam bhi nahi. Wo to adrishya hai, jo kabhi pathar me dikhayee de jaata hai, kabhi kis ibaarat me, kabhi kis ki hansi me, kushi me, kabhi kisi ke gham me, mandi masjid to sirf uske ek ahsaas hai. Wahan jaat hi uski adrishya akriti ek roop leti hai- uski chhavi aapki manodasa ke mutabik dikhti hai. Agar aap is laukik chhavi kea age apne ko tuchchh maante hai, to samajhiye aap ishwar-allah-god-guru se mil chuke.

Bas itna hi ishwar hai, uska vishwas hai। Isse aage sab andhvishwas। Chahe koi ishwar ko laakh laukik roop me dikhane ki koshish kare, uske padchinh dikhaye, koi uske smriti chinha dikhaye, saab TRP batorne ka khel hai। Aap ise na dekhen to hi achcha. Aap jab tak apne ko adrishya se upar samjhenge, ko Sai, ko ram, koi pagamber, koi gur, koi god apka kalyan karne nahi ayega. Na shani taras khayega, na mangal ki mar kam hogi, gur, budh, shukar aur surya koi shubh nahi karega. Hum tv walon ka kaam hai kehna…

Aisa nahi ki is ‘kissagoi’ ki gaaj hampar nahi girti, balki hum par to kaher tooti hai। Jish bhagwaan ko itna publicity dete hai, uska bhajan gaane ke liye itne bhakt paida karte hai, use to hum par puja karne wale se bhi zyada meherbaan hona chahiye, lekin, kahan, agar aisa hi hota to agle-pichhle saare bayan alag hote.

Yahan to atiranjana ke itne aadi ho gaye hain, ki jo bhi dikta hai, samananter hi dhikhta hai। Hum samananter sochne ke aadi ho gaye hai, kalpana ki inhi dono rekhayon ke bich kahin asal mudda reh jaata hai. Hum side se nikal jaate hai, mudda pichhe reh jaata hai. Abhi dekhiye, har jagah ‘deal hi deal’ nazar aata hai, deal ke ankde dikh rahe hai, khinch taan dikh rahi hai, kharid farokht ki boo aa rhee hai, ek se ek bayan dikh rahe hai, kaisa dhong dhikh raha hai bhai. Paksh wale janta ki duhayee de rahe hai, to vipaksh wale desh ki duhayee de rahe hai, saaf dikhta hai virodhabhass- left walon ki laffazi, mahangai par to punch satka kar baith gayee, deal par sarkaar gira rahe hai. Ab aap mat sochiye main pro-deal insaan hun. Main to kaheta hoon ki zaroor girawo sarkar, lekin girane ka jo issue choos kiya usne to apki pol hi khol di. Is loktantra me jis party ko janata ke khana peena mudda nahi laglta, use desh ke bhavishya par khatrya kaise nazar aa sakta hai. Jo janata ka nahi sochti, wo desh ka kya sochti. Sareaam chutiya bana rahe hai left wale, Aur hum unka chutiyapa dikhaye jaa rahe hai.

Ye to badi lambi choudi rajneetik bahas hai bhai, hum yahan tak kaise aa gaye, yahi to haqiqat ke ghalmel ke natiza hai. Pura nazara hi monotones ho jaata hai.

रविवार, जुलाई 13, 2008

पांच दिनों की प्यास

आगे बढ़ने से पहले गौर फरमाइए, टाइटिल के अनुप्रास पर- 'पांच' और 'प्यास' के बीच गजब का आकर्षण है.इस अनुप्रासिक अनुभव के साथ एक दुखीआत्मा दोस्त ने इस बार फिर कसम खाई है सावन में शराब नहीं पीने की, पांच दिन से प्रैक्टिस कर रहा है बेचारा। लेकिन उसने गलती कर दी- ये बात उसने फिर बता दी अपने दोस्तों को- उन दोस्तों को जो न्यूज चैनल में काम करते हैं।फिर क्या था, दोस्तों ने बना दिया उसकी कसम का 'शो ओपेन', और फिर सनसनाता हुआ पांच मिनट का 'पैकेज'।
अब आगे पढ़िए-
पांच दिन
सिर्फ पांच दिन...
जी हां, सिर्फ पांच दिन बाकी है
सावन शुरू होने वाला है
उसने कसम खाई है
इस बार नहीं तोड़ेगा कसम
सावन में शराब पीने की कसम
वो कर रहा है रोज प्रैक्टिस
संयम रखने की प्रैक्टिस
हफ्ते भर से हाथ तक नहीं लगाया
न ग्लास को, न बोतल को
लेकिन,
एक रात
जब वो अकेला था
मचल गया जब वो तन्हा था
पानी भर आया उसके मुंह में
उसने आव देखा न ताव
फ्रिज से निकाला पानी
फ्रीजर से बर्फ के कुछ टुकड़े
फिर उठाई ली उसने बोतल
और खोल दी ढक्कन
उड़ेल दी ग्लास में
और बुझा ली उसने
पांच दिनों की प्यास
पांच दिन बाकी है सावन आने में, पता नहीं कमबख्त, इस बार कितनी बार तोड़ेगा अपनी ही खाई कसम
हा...हा...हा...हा...

रविवार, जून 22, 2008

आसक्त कहीं का...



कई बार डूबता है

एक डुबकी के बाद

पकड़ने की कोशिश करता है

पानी के अंदर उठ रहे बुलबुलों को

डरता है कि कहीं सतह पर जाकर शोर न कर दें

वो पानी के अंदर बुलबुले पकड़ रहा है.

शनिवार, जून 21, 2008

क्यों सर??

मैं चाहता हूं
मेरी भी कोई निशानी बची रहे. मैं चाहता हूं कुछ चीजों में मेरा अहसास बाकी रहे.

इस उतपाती दुनिया में रूह कांप जाती है, इस खयाल से ही कि हमारी जीती जागती ख्वाबों सी दुनिया कल सितारों की बात होने वाली है.

इसलिए, मैं चाहता हूं मैं न सही मेरे पांवों के निशान तो बाकी हों, जिन रिश्तों में पला बढ़ा हवाओं में उसकी खनक ही बाकी रहे.

सच कहूं- दिल से...
तो मैं दरअसल चाहता हूं पूरे आकार में मौजूद होना
हर उस तहरीर में
हर इक तदबीर में
उसकी हर तस्वीर में
तकदीर में...
शायद इसलिए नहीं...
कि रेखाओं को गवारा नहीं
मेरी गुजारिश तक भी!

कुबूल कीजिए सर,
शा...
सॉरी, शा से पहले बा होता है,
सो बाआ- आदब कुबूल कीजिए
जाने कौन सी बयार है, जो बदबू की तरह निकल रही है

ये सर हैं...जो कहते हैं, दुनिया टूटने वाली है, बिखरने वाली है, आफत आने वाली है धरती फटने वाली है, समंदर पलटने वाला है- हर तरफ आग ही आग, गोले ही गोले, ऐलान कर दो दुनिया का मटियामेट होने वाला है,
डराओ सालों फिजूलखर्च लोगों को, साले अपनी सैलरी की शान में संसार की लेनी कर रखी है, जल थल वायु हर तरफ नाश मचा रखा है, हार्ड अटैक से मरने दो सालों को...
अरे हमको तो हकीकत पता है न...खबर बनाओ और मस्त रहो...

पता नहीं क्यों
कयामत की तस्वीरें देखकर मेरे दिल में फिदायीन से खयाल उठते हैं. कभी नाज होता है अपनी धरती की ताकत पर, उसकी उर्जा पर,
लहरों की जिजिविषा पर...
उसके अंतः की आग पर
आंधी पर
इंसानी नाम वाले तूफानों पर
मंत्रमुग्ध हो जाता है मन
धरती के रौद्र रूप पर

फिर भी हम कितना तुच्छ समझते हैं अपने आगे

हम अक्सर भूल जाते हैं,
कि धरती हमें बरबाद करने के लिए नहीं डोलती,
वो हमें हमारे ही पापों से बचाने की जद्दोजहद कर रही है
वो हम सबकी जिंदगी की जंग लड़ रही है,
वो शांत हो जाएगी जो जंग में हम उसके साथ आएं

अरे महाराज,
आप भी कुछ साथ दीजिए,
जानते ही हैं स्वयं सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है
आगे बढिए जनाब।
अपने होने की कुछ तो निशानी दीजिए

क्यों सर,
ठीक कहा न?

सोमवार, जून 09, 2008

पत्नी का 'पंच'

आज कल ऐसा हो गया है कि पत्नी के सामने उफ् करना भी मुश्किल है- वो हैं तो हाउस वाइफ, लेकिन 'पंच' किसी एड फिल्ममेकर से कम नहीं। कभी कह कर देख लो- 'क्या लगी रहती हो दिन भर नाच गाने में यार, सास-बहू से मोह भंग हुआ तो रियालिटी शो के फेविकोल से चिपक गई'। इतना अच्छा डायलॉग बना कर रखा है, 'ये रियालिटी नहीं भइया, फैटसी है' लेकिन अक्सर इसे मारने से डर लगता है, करें क्या बच्चे भी उसी फेविकोल से चिपके हुए हैं.

कहने का मतलब, घर में बहुमत 'रियालिटी शो' के पक्ष में है. अल्पमत में रहते हुए उफ् करना कितना मुश्किल होता है, ये लोकतंत्र में किसी से छुपा है. वो चाहे देश हो या घर क्या फर्क पड़ता है.

कल हंसते हंसते वो डायलॉग मार ही दिया- ये रियालिटी नहीं भैया, फैटसी है।

बात अभी पूरी भी नहीं हुई थी, कि तीर की तरह निकला पत्नी का पनपनाता हुआ पंच-
'आपके 'भगवान दर्शन' से तो बेहतर है भाई साहब!...आप गौर नहीं फरमाते इसी फैटसी से आप लोगों का बेड़ा पार लग रहा है, अपने न्यूज चैनल पर तो जैकेट बदल बदल कर तीन तीन साल पुराने चुराने चुटकुले को कभी 'हंसी के हंसगुल्ले' बनाकर, तो 'कभी हंसी का गोला', 'कभी कमाल की कॉमेडी', तो 'कभी मस्ती की पाठशाला' का हेडर मार मार कर चार चार बार दिखाते हो यही फैटसी, प्राइम टाइम तक को तो बख्शा नहीं। घर में आकर इतना सड़ा हुआ हो गया रियालिटी?'

अब कीजिए बचाव, गनीमत है पत्नी ने भाई साहब कहा था (मतलब खुश थी)

'नहीं, नहीं, वो मतलब नहीं है मेरा, मतलब ये है कि कहीं कोई ईमानदारी तो होती नहीं इन शोज में, कभी अपने पंसद के कंटेस्टेंट्स को जीतते हुए देखा है, हजारों एसएमएस भेजने के बाद कभी करोड़पति, या पांचवीं पांचवी से कॉल आया?'

अब बनाईए कोई कनविंसिग डायलॉग, पत्नी ध्यान से सुन रही है, शायद अगले पंच की तैयारी कर रही है।

'बड़ी अक्ल वाले हो गए हैं छोटे पर्दे के मालिक...'

'वो तो है...'

'देखती नहीं हो, शारे शो बच्चों के पढ़ने के टाइम पर ही बना रखे हैं, बच्चे शो देखेंगे तो एड के वक्त भी चिपके रहेंगे, फिर चिप्स, चॉकलेट, और कुरकुरे मांगेगे, बड़े एसएमस पोल करेंगे सो अलग, घर में घुस कर सपने बेच रहे हैं साले...हमसे पूछ कर हमीं को लूट रहे हैं...!'

ना ना, पत्नी को कंजूसी कराने का ये फॉर्मूला शायद कनविंसिंग नहीं लगा, कुछ और ढूंढिये!

'दरअसल अच्छा नहीं लगता, दिन भर खबरों की सड़ी गली रियालिटी को निपटा कर आते हैं, मूड खराब हो जाता है, घर आते ही ये फैंटसी देख कर दिमाग की नस फटने लगती है...'

मुझे पता है पत्नी को मेरे दिमाग की नस की चिंता है, लेकिन मुझे क्या पता था, इस डॉयलॉग के बाद बात वहीं पहुंच गई है जहां से शुरू हुई थी...

'वही तो मैं भी कहती हूं, मेरी जान, जैसी खबरें आप लोग दिखाते हो, उसके लिए दिमाग की नस क्या ताननी, खुराक तो तय लगती है आप लोगों की। दिन भर या तो क्रिकेट, क्राइम या सिनेमा है(3Cs), इन सबके बीच ठूंसने के लिए हजार चीजें हैं, शुक्र है, मंगल है, शनि है, एलियन हैं, यूएफओ हैं, और तो और अब भेड़ बकरी और बंदर सियार भी हेडलाइन बनाने के लिए काफी है. कुछ नहीं और नहीं तो खली है ही. इंडिया आने के बाद उसकी तो टीआरपी अच्छी खासी हो गई है. पहले तो इस 'खलबली' को कुछ चैनल अछूत मानते थे, अब वो भी इस पर लौट आए हैं. बहार ही बहार है, इसमें दिमाग की नस फटने वाली क्या बात है...

मेरी चुप्पी पर पत्नी को लगा जैसे उसने वाकई नस पकड़ ली हो.

'तुम न, ज्यादा टेंशन लेते हो, अच्छा ही है जो चार पांच बार रियालिटी शो चला देते हो, खाने पीने का टाइम तो मिल जाता है, वर्ना इतनी मेहनत से बनाया गया टिफिन घर वापस लाते थे। तुम्हारी नजर में फैंटसी ही सही, सेहत के लिए बढ़िया है रियालिटी।'

कहां तो मुझे पत्नी को कनविंस करना था, पत्नी ने मुझे ही स्पीचलेस कर दिया

'तुम्हारी ही नहीं, मालिक की भी सेहत ठीक रहती होगी, कुछ तो बेहतर टीआरपी मिलती होगी'
बच गए भैया, यही एक खेल था जो पत्नी से शेयर नहीं किया- टीआरपी का खेल (खबर बनाने का खेल), वरना पंच इससे भी ज्यादा चांटेदार होता, लेकिन लगता है भनक लग ही गई है. हर हफ्ते पूछती हैं, कौन नंबर वन आया है इस बार. अब पत्नी होने के नाते इतना तो बताना ही पड़ता है. फिर इसके आगे उनको कुछ बताने की जरूरत नहीं पड़ती. वो टीआरपी हासिल करने का पूरा तिकड़म समझ जाती हैं.
कहती है- अच्छआआआ...वो...हूंम्म्म....

अच्छा एक बात बताओ, ये साईं के वीडियो वाला क्या लफड़ा है, एक बता रहा है चमत्कार, तो दूसरा गरिया रहा है...

मैने तो हाथ ही जोड़ लिए भैया- 'रहने दो मेरी मां, नौकरी खाओगी क्या...!'

गुरुवार, जून 05, 2008

एक तस्वीर कु-बोली के खिलाफ


बंदरिया की गोद में पिल्ला! इंसान के लिए सबक हो या न हो (क्योंकि ये लेने पर डिपेंड करता) इस तस्वीर से जो जाहिर है वो मूलतः एक क्रिया है- प्रतिक्रिया (भाषाई) से बिना शक बेहतर. तस्वीर की कहानी कुछ यूं है- जम्मू के एक इलाके में एक कुतिया रहती थी. अभी कुछ दिन पहले वो बीमारी की वजह से गुजर गई- अपने इस इकलौते पिल्ले को अकेला छो़ड़कर. बशिंदों के लिए ये कोई बड़ी बात नहीं थी (दरअसल कोई घटना ही नहीं थी.) लेकिन कभी कभार गांव में आने जाने वाली इस बंदरिया का दिल पसीज गया जब उसने अकेले में पिल्ले को कूं...कूं करते देखा. वो उसे उठा ले गई. इस पर लोगों का ध्यान तो जरूर गया- अरे, बंदरिया पिल्ले को उठा ले गई, चलो जाने दो, मुसीबत गई, जैसा मुंह वैसा रियेक्शन. लेकिन बंदरिया ने जिस हिफाजत और प्यार दुलार से पिल्ले का पालन पोषण शुरू किया, उसे देख सब दंग रह गए.


जो रिश्ते शब्दों की वजह से टूट रहे है, भाव ने उसे नया जन्म दे दिया.


कौन कहेगा, इंसानियत सिर्फ आदमी की जागीर है?

मंगलवार, जून 03, 2008

अगर आप ईश्वर को मानते हैं तो...

मानना उस अर्थ में नहीं, जैसा टीवी की खबरों में दिखाया जा रहा है- मंगल के दिन शनि का जन्मदिन मनाया जा रहा है, कुछ अबूझ तस्वीरों के जरिये ब्रह्मांड का रहस्य सुलझा लेने का दावा किया जा रहा है. और तो एक धुंधले सफेद साये को साक्षात ईश्वर का रूप बताया जा रहा है, गजब का कन्फर्मेशन है टीवी एंकर्स की भाषा में...!

निराधार...! बकवास...!! कोरा अंध-विश्वास...!!!
ग्रहों पर जीवन की तलाश अलग बात है, लेकिन ईश्वर की साक्षात तस्वीर पर मुहर? विज्ञान इसकी कतई इजाजत नहीं देता. वो चीजों के सापेक्ष संतुलन को समझता है, और जिस सीमा के बाद गणना शून्य के नीचे चली जाती है...वहां इनफिनिटी का मार्क लगा देता है. मतलब, जो दिख जाए, वो ईश्वर ही क्या. फिर तो वो संग्रहालय में कैद किया जाने वाला आइटम बन जाए. आदमी इतने सवाल कर बैठेगा- ये क्यों, वो क्यों, ये ऐसे क्यों, वो वैसा क्यों, कि वो अपना सिर पटक लेगा, वो पागल हो जाएगा. अपने ही रचे ब्रह्मांड के संतुलन को लेकर कन्फयूज हो जाएगा.
आदमी अपनी संरचना तो समझ नहीं पा रहा. जबकि सभी धर्मोंग्रन्थों में ये कहीं न कहीं, किसी न किसी रूप में कहा गया है इंसान ब्रह्मांड की पहली कड़ी है. इसका पूरा रहस्य खुद उसके अंदर है. आदमी समेत हर सजीव का मन (एक अदृश्य अंग) जीवन के संतुलन का सबसे बड़ा कारक है. ये वो कोना है जो पूरी तरह 'लीकेज प्रूफ' है, इसमें तीनों काल-भूत भविष्य और वर्तमान समाहित है. उसने क्या किया है, क्या करने वाला है और क्या कर रहा है तमाम सूचनाएं भरी होती है. बुरी से बुरी भावना, घृणा, द्वेष, कटुता, पशुता, लालच, घमंड, जो भी कह लें सब इसी में कैद है, लेकिन इसका पता सामने वाले को नहीं चलता. पता वही चलता है, जिसे हम चाहते हैं, जिन्हें हम शब्द देते हैं.
यानी दो जीवों (आदमी समेत) के बीच का संतुलन हमारी भाषा पर डिपेंड करता है. अगर खराब होता है, तो उसके लिए सीधे-सीधे जिम्मेवार हम हैं, ईश्वर नहीं, क्योंकि संतुलन कायम रखने के लिए उसने लीकेज-प्रूफ मन दिया, लेकिन हमने उसे जाहिर करने के लिए छीछालेदार भाषा बना दी. तेल, पानी, गैस (और बेशक ब्लॉग) के झगड़े कहने को है, दुनिया के तमाम कलेश की वजह है हमारी कलुषित भाषा,जो मन के उन तमाम कलुष विचारों से पैदा होती है, जिन्हें ईश्वर के नियम के मुताबिक मन की कालकोठरी से बाहर नहीं आने देना है. संतुलन के लिए निजता हर हाल में कायम रहनी चाहिए. क्योंकि जब इसपर चोट होती है, तो फिर इंसान ईश्वर को भी नकारने पर उतारु हो जाता है.
भाषा अपने मूल रूप में पानी की तरह सहज होती है, लेकिन आदमी की आदिम आदत है, वो अपनी भाषा से अलौकिक संतुलन का कबाड़ा करता रहा है. जिस किसी ने भी व्यंग्य विधा की रचना की होगी, उसने आदमी की इसी कमजोरी की नस पकड़ी होगी- कि उसकी आदत भी निबह जाए और बात भी न बिगड़े, उसके मन का कलुष, उसकी तल्खी जब निकले, तो हास्य की चासनी में लिपट कर, लेकिन लगता है अब आदमी का काम अब भाषा की इस चासनी से काम नहीं चलने वाला.
ये कोई प्रवचन नहीं, मैं धार्मिक परिभाषा के मुताबिक निहायत ही नास्तिक आदमी हूं. वो तो आदमी के बीच बिगड़ते संतुलन ने मन में ईश्वर का खयाल ला दिया. सोचने पर मजबूर कर दिया कि अगर यूं ही चलता रहा तो क्या होगा उसके हैरतअंगेज संतुलन का. आप तो खैर ब्लॉग-ब्लॉग भटकने वाले पाठक हैं, देख ही रहे होंगे, भाषा के नाम पर कैसी गंद मची है, मौलिक रूप में ब्लॉग तो वो जगह है, जो किसी भी और माध्यम- टीवी, रेडियो, अखबार हर माध्यम से ज्यादा जुड़ने का मौका आदमी को देता है. लेकिन यहां तो निजी छींटाकशी का दौर चल पड़ा है. कई कई ब्लॉग तो ऐसे हैं, जिन्हें आप सार्वजनिक रूप से पढ़ नहीं सकते.
जुड़ने से ज्यादा पुरानी दोस्ती तक टूट रही है.
कुछ करना होगा बंधू!

सोमवार, मई 26, 2008

माई नेम इज आरुषि!

'मम्मा, अरे इधर आओ जल्दी, अरुषि को उसके पापाने ही मारा है...देखो टीवी पर क्या आ रहा है...'
बेटी की आवाज लगभग चीख रही थी. बहुत तेज नहीं थी, पर इतनी बेचैनी से भरी थी कि मेरी गहरी नींद भी खुल गई. 18 घंटे के बाद सोया था. रात भर जागने के बाद देर दफ्तर से लौटा था. नींद खुल गई थी, लेकिन बिस्तर से उठकर ड्राइंग रूम में जाने का मन नहीं किया, मैं बिस्तर पर पड़े पड़े बेटी की बेचैनी, उसके चेहरे के बदलते हाव भाव देखता रहा. 11 साल की है. अब वो हर बात समझती है. इस उम्र में स्थिरता कहां होती है.

कभी मेरी डायरी में लिखी एक कविता पढ़कर उसे चहकते देखा था, वो कविता क्या उसी से जुड़ी एक घटना थी, जिसे मैने डायरी पर कहीं दर्ज कर दिया था-
"पापा, वो देखो ना, कितना सुंदर है वो अमरूद
देखो, कितना पीला, कितना खुशबूदार
पापा, मेरे हाथ पहुंच नहीं रहे
अपने कंधे पर चढ़ा लो ना
कंधे पर खड़े होकर बेटी ने तोड़ लिया अमरूद
खुशी इतनी जैसे जमाना जीत लिया हो
बेटियां जो बाप के कंधे पर होती हैं
इसी तरह आसमान छूती हैं."


तब उसने गोद में चढ़ते हुए कहा था, पापा आपने गांव वाली उस घटना का कविता बना दिया है न...मैं समझ गई, मैने ही तो आपके कंधे पर चढकर अमरूद तोड़ा था.

मैं पिछले कई दिन से देख रहा था, अखबार, टीवी, हर जगह वो अरुषि से जुड़ी खबर को फॉलो कर रही थी, लेकिन एक बार भी सीधे पूछा नहीं, पापा, ऐसा क्या हुआ कि एक पिता ने बेटी को मौत के घाट उतार दिया. शायद उसे भी कोई असमंजस हो...

ये सबकुछ मैं बिस्तर पर लेटे ही सोच रहा था, करवट बदला तो उसका स्केच बुक हाथ लगा- जिसके एक पेज पर पेंसिल से एक लड़की की आकृति बनी हुई थी, उसके नीचे लिखा था- माइ नेम इस आरुषि...
देर तक मैं उस स्केच को देखता रहा, टीवी पर आ रही खबरों के शोर से अलग मुझे उसमें एक ऐसी छाया दिखाई थी, जो देह से अलग होने के बाद रूह बन जाती है, सबके दिलों में बस जाती है. मेरे शब्दों में कुछ इस तरह-
मैं आरूषि हूं
जाना पहचाना है मेरा नाम
आप लोग यही सोच रहे होंगे
किसी की परछाई हूं मै
मैं परछाई नहीं एक रूह हूं.
नाजुक सी, बड़ी पाक सी
एक छोटी सी मुस्कराहट
जो लग जाऊं दूधमुंहे बच्चे के मुंह
तो ममता के मुंह में पानी भर जाऊं
अन्नमुंहे के होंठों पर पसर जाऊं
तो शरारत बन जाऊं
आशिक के लब पर लग जाऊं
तो लाजवाब बन जाऊं.
मैं एक रूह हूं सिर्फ, मेरा नाम आरुषि है.
इस नाते मैं आपमें भी हूं, और उसमें भी.
उसकी शक्ल में मुझे अपनी रूह दिखाई देती है.
मैं किसी की परछाई नहीं, फिर भी.
उसकी कुछ कहती हुई आंखों के शोर में अनसुनी हुई जाती हूं.
याद तो आपको भी होगी वो तस्वीर.
आप ही ने तो दिखाई थी,
वरना, मैं कहा देख सकती थी बेसुध बंजारन.
उस खामोश तस्वीर ने जैसे मेरी पहचान तय कर दी हो.
बस, इतने भर की आरुषि हूं मैं.

बुधवार, मई 14, 2008

कमिंग अप...


अरसा हो गया आपसे मुखातिब हुए.
आप उपरोक्त वाक्य की नाटकीयता पर मत जाइए, वाकई अरसा हो गया खामोश हुए.
आप कह सकते हैं इस खामोशी को निर्जन चुप्पी, एक मरी हुई खामोशी. मैंने अपने होने का आखिरी निशान (पोस्ट) मोहब्बत के पर्व से ठीक एक दिन पहले दिया था (13 फरवरी), और आज जब मैं अपना होना फिर से साबित कर रहा हूं, ये आतंक की अगली रात है- जयपुर ब्लास्ट के गुबार से भरी हुई, खून में सनी, कराहों में लथपथ, टूटे हुए भरोसों की एक काली रात...
बात जिस निर्लज्ज नायक के साथ खत्म हुई थी, ये रात उससे कहीं ज्यादा खतरनाक हो चुकी है. वो नायक अपनी करतूतों की वजह से खुद हास्यास्पद हो गया है, वो जितनी जोर से मराठा राग अलापता है, खुद को महाराष्ट्र का अकेला हितैषी बताता है, लोग अब उतनी ही जोर से बोलने लगे हैं- देखो, फिर बोला राज, अगर हमारी टीवी की भाषा में कहें तो राज ने फिर उगली आग, फिर उगला जहर, अब आखिर हम कितनी बार कहें फिर, हर दूसरी बात तो ये फिर-फिर हो जा रहा है, 'राज' के साथ खबर की स्क्रिप्ट भी हास्यास्पद होती जा रही है, सो मैंने रियेक्ट करना छोड़ दिया...क्या मुंह लगाना!

लेकिन, ये चुप्पी ठीक नहीं थी...
पता नहीं आज ऐसा क्यों लग रहा है, क्यों लग रहा है कि आदमी का अपनी खोल में दुबक जाना खुदकुशी के बराबर है, गुलाबी शहर की जख्मी गलियों ने जागती आंखों के तमाम सपने बेमानी कर दिए हैं, डर लगता है अब कभी खुद को लेकर खुशफहमी पालने में, जिंदगी इतनी सस्ती हो चुकी है नफरत के सौदगारों के लिए. वैसे साबित तो इन्होंने कई बार किया है- कि जब जब कोई मजहब या पंथ, राष्ट्र या समुदाय का अगुवा बनने की कोशिश करता है, उसका इकलौता हितेषी होने का दावा करता है, वो फिर इंसान नहीं रह जाता, क्योंकि वो इंसानियत की कीमत पर अपने संबंधित समुदाय का अस्तित्व चाहता है, इसे हासिल करने के लिए वो लाशें बिछा सकता है, और जब उसका अस्तित्व कायम हो जाए, तो भी लाशें बिछाने का सिलसिला नहीं थमता, क्योंकि तब वो अपनी अहमियत बनाए रखने के लिए वो तरकीब लगाता है- डिवाइड एंड रूल...

किसी को लग नहीं रहा है, लेकिन ये फार्मूला आतंकवाद से भी ज्यादा खतरनाक हो चुका है. धमाके अब दहशत पैदा करने से ज्यादा, भाईचारा तोड़ने के लिए किये जा रहे हैं. आतंकवादी तो आतंकवादी दुनिया भर के सियासतदान भी यही फार्मूला अपना रहे हैं.

ये बेहद खतरनाक समय है, ये वक्त खामोश रहने का नहीं हैं, जिंदगी को हमें हमेशा 'टीज'* करते रहना होगा, ताकि अगली सांसों को चलते रहने का भरोसा पहले ही मिल जाए, टूटते हुए भरोसे को जुड़े रहने का आस मिल जाए, घुटती हुई आस को ख्वाबों का जहां मिल जाए, और दर्द से कराहते जहां के जख्म को इंसानी मरहम मिल जाए.
So, lets fire the band- Coming up next

*(टीवी की भाषा में टीज करना ब्रेक से पहले अगली खबर की झलक दिखाने को कहते हैं, ये दर्शको को बुलेटिन से बांधे रखने का पॉपुलर फार्मूला है.)

गुरुवार, फ़रवरी 14, 2008

निर्लज्ज नायक!




देखने वालों के जिगर में जाने कब तक ये तस्वीर...राज ठाकरे की ये विजयी मुद्रा...जिस पर आरोप हो लोगों की भावनाएं भड़काने का... जिसके घर पुलिस गई हो गिरफ्तारी करने...उसके चेहरे पर भला ऐसी मुस्कान होती है...कौन नहीं कहेगा, राज ठाकरे अगर कानूनी तौर पर अपराधी हैं...तो ये एक अपराधी के चेहरे पर पसरी निर्लज्ज मुस्कान है...


और वो अपराधी मुस्कराए नहीं तो क्या करें, जिसकी गिरफ्तारी के लिए खुद को स्कॉटलैड यार्ट के मुकाबिल कहने वाली मुंबई पुलिस तीन दिन से प्लानिंग करें...दो कदम आगे बढ़े तो चार कदम पीछे हटे...गिरफ्तारी से पहले सौ बार अंजाम के बारे में सोचे- वो गुनहगार मुस्कराए नहीं तो क्या करें...

ऐसी शानदार गिरफ्तारी पर तोड़-फोड़ और मारपीट करने वाले समर्थक हो-हंगामा तक न करें ऐसा कैसे हो सकता है...शिवाजी पार्क के चप्पे चप्पे पर पुलिस रही...लेकिन किसी की कोई मजाल कि राज ठाकरे के समर्थकों को चुप करा दे...वो खुलेआम पुलिस के सामने राज के अपराधों का खुला समर्थन कर रहे थे- और पुलिस खुलेआम राज ठाकरे को मौका दे रही थी- बड़ी शान से अपने समर्थकों से शांत रहने की अपील करने का...उनकी नजर में मराठा हीरो बनने का...


कोई है जो मुंबई पुलिस से पूछ सके कि- अगर ऐसी ही नारेबाजी कोई दाउद इब्राहिम या अबु सलेम के समर्थन में करे, तो वो क्या करेगी...आखिर राज का भी अपराध तो कम नहीं...जो शख्स जान बूझ कर देश की आंतरिक शांति को तलवार की धार पर खड़ा कर दें...विविधता में भी भाईचारा का भाव रखने वाले देश में सूबे की लकीर खींच दें...लेकिन नहीं, मुंबई पुलिस बस चुप-चाप देखती रही...बिछी रही राज ठाकरे की सुरक्षा में...गिरफ्तारी से लेकर कोर्ट में पेशी तक....


कोई कैसे नहीं समझे, कि ये गिरप्तारी और कोर्ट में पेशी सिर्फ एक दिखावा है...जिसे मिलती है 14 दिनों की न्यायिक हिरासत...उसे मिल जाती है दस मिनट में जमानत...वो भी उस हालात में जब गुनहगार के फरमाबदार मुंबई ही नहीं पूरे महाराष्ट्र में उधम मचाए हुए हैं...और सबसे बड़ी बात राज को इस बात का मलाल तक नहीं...तो क्या राज ठाकरे के साथ सरकार भी ये मानती है कि महाराष्ट्र में सूबावाद के नाम पर जो हो रहा है...वो ठीक है...अगर ऐसा है तो इतनी नौटंकी की क्या जरूरत थी...

बुधवार, फ़रवरी 06, 2008

तेरा क्या होगा राज!


मै भारत के उत्तरी इलाके में पैदा हुआ हूं और इसमें मेरी कोई गलती नहीं. मैं न तो आज तक मुंबई गया हूं और न ही राज ठाकरे को जानता हूं- इसमें भी मेरी कोई गलती नहीं. राज ठाकरे को पहचानता जरूर हूं- टीवी और अखबारों के जरिए- ये मेरा दुर्भाग्य है कि न चाहते हुए भी उसकी छवि जेहन में साफ बसी हुई है- जबकि उसने चाचा ठाकरे का भतीजा कहलाने के सिवा कुछ खास हासिल किया नहीं है.

एक
ऐसा भतीजा, जिसने हर पल चाचा के जूते उतारने का इंतजार किया. अपने को चाचा के बेटे (उद्धव) से ज्यादा मेंटेन रखा. सजे संवरे जुल्फ, क्रीम से मला हुआ चेहरा और लिपकेयर लगे होंठ, यूनीफॉर्म की तरह चकाचक सफेद कुर्ता, और हां, वो कार्बन फ्रेम का चश्मा. वो जानता था- खुद को चाचा के बेटे से असरदार दिखने के लिए ठाट-बाट में एकरूपता जरूरी है. मैं फिर से कह रहा हूं- मैं उसे करीब से कतई नहीं जानता, ये इमेज, जिसे बयान कर रहा हूं टीवी और अखबारों की रपट से बनी है. मुझे उसके उमर के बारे में भी नहीं पता, दिखता तो मेरी उमर का ही है- इसलिए मेरा उसे 'अरे' कहना खटकना नहीं चाहिए. वो ऐसी कोई ऊंची चीज नहीं कि उम्र से आगे निकल जाए, बल्कि उसकी छिछोरी सोच तो उसे उम्र से नीचे गिराती है. उसे पता नहीं, ये और बात है. बल्कि मैं तो कहता हूं उसे बखूबी पता, तभी वो मुंबई को सिर्फ महाराष्ट्र का बताता है.

दरअसल, दूसरों की जूती पर नजर रखने वाले होते ही ऐसे हैं. जब अपनी बारी आती है, तो 'ओरिजिनल जूता पहने वाले' से भी दो कदम आगे बढ़कर हरकत करने लगते हैं. राज ठाकरे को बाला साहेब की जूती पहनने को तो नहीं, मिली जिसकी ताक में वो अधेड़ हो गया, और आज जब खुदा अपने लिए जूता बनाकर पहनना पड़ रहा है, तो ऐरु-गैरू-नत्थू-लखैरू को बटोर कर ऐसी हरकतें कर रहा है जो जिसकी कल्पना आज तक बाल ठाकरे भी नहीं किए होंगे. उत्तर भारतीयों से जलन उन्हें भी रही है जिस तरह वो मुंबई जाते हैं और अपने सपने को पूरा करने में खुद को झोंक देते हैं-प्रोफेशन कोई भी हो, हर जगह कामयाब होते हैं, लेकिन राज तो व्यावहार और सोच दोनों ही स्तर पर गुंडई का परिचय दे रहा है- बिलकुल किसी गुण्डे की तरह सीमित सोच है राज की. ऐसे शख्स के लिए दुनिया की हर भाषा का ग्रामर साफ तौर पर कहता है- इनके लिए आदर सूचक शब्द लगाना मना है, अगर आप ऐसा करते हैं, तो आप उसके कृत्य को स्वीकृत करते हैं. आखिर हम ये क्यों मान ले(विलास राव देशमुख की तरह) कि राज मुंबई का वो प्रतिनिधि है जो अमिताभ बच्चन से पूछे कि भैया, यूपी में स्कूल क्यों खोला, किसी मराठी फिल्म में काम नहीं किया, या मनोज तिवारी को धमकाए कि काम करते हो भोजपुरी फिल्मों में और रहते हो मुंबई में- क्या चक्कर है. राज होता कौन है बड़ा सवाल तो यही है.

दुनिया का कोई भी बुद्धिमान (सभ्य कहना ज्यादा उचित होगा, क्योंकि राज के पास कम बुद्धि नहीं) ये नहीं कह सकता कि संघ के कानून में बंधे किसी भी राष्ट्र के किसी भी शहर का दरवाजा नागरिकों के लिए उनके जन्मस्थान के मुताबिक खुलेगा. जो मुंबई में पैदा हुआ है मुंबई उसी की होगी. लेकिन राज तो मुंबई पर ऐसे हक जता रहा है जैसे मुंबई महाऱाषट्र की इकलौती पुत्री हो, और इसके आसपास आने वाले तमाम लोग इसे बुरी नजर से देखते हैं. ये माना कि राज मुंबई का एक जिम्मेदार नागरिक है, उसे भी (तमाम कई लोगों की तरह) शहर की चिंता है. ये बात भी मानने लायक है कि बढ़ते जनसंख्या दबाव के कारण शहर का बुरा हाल है, लेकिन राज जो कर रहा है उससे तो इस बात की गारंटी मिल रही है कि मुंबई या महाराष्ट्र के दूसरे हिस्सों में पैदा हुए लोग शहर को नुकसान नहीं पहुंचा रहे. पूरी दुनिया जानती है, कि मुंबई जिसके लिए बदनाम है वो किन लोगों की वजह से (उनका ओरिजिन क्या है) और अगर दुनिया के नक्शे पर इसकी पहचान है तो किनकी वजह से...(इनका ओरिजिन क्या है). सब जानते हैं मुंबई ठाकरे(ओं) की वजह से रौशन नहीं. ऐसे में इसकी बरबादी का दोष उत्तर भारतीयों पर थोपना वसुधैव कुटुंबकम का जाप करने वाले देश का अपमान है.

और जब तक देश का संविधान कायम है, देश का हर नागरिक आर्थिक राजधानी में 'घुस कर काम करेगा'. ये उसका हक है. और जिस दिन ये हक कानूनी तौर पर छीन लिया जाएगा, उस दिन देश देश न रहेगा

राज सोच लो उस दिन तेरा क्या होगा!

बुधवार, जनवरी 30, 2008

कहां हो बापू?

जाने कितने बरस पहले कह गए बापू, विकास को 'सबसे गरीब' की नजर से देखो, सबसे पहले गांव को सुधारो, हाशिये पर खडे आखिरी आदमी को मुख्यधारा में लाओ, संसाधनों का बांटवारा ऐसा करो, कि सबको बराबरी का अहसास हो, समाज में अपनी हिस्सेदारी का बोध हो, निहायत ही देशी अंदाज़ में समझाया बापू ने- जिनती कीमत वकील के काम की, उतनी ही कीमत नाई के काम की. लेकिन काहे को...ये ससुरे तो...

छोड़िए हम कौन होते हैं, इस बहस पर मुंहचोदी करने वाले, आपके पास टाइम भी तो नही, लेकिन जाने से पहले ऊपरवाले सीन को फिर से देखते जाईए कि बापू की बात न मानने का हस्र क्या होता है.

नेट सर्फिंग के दौरान कहीं से मिल गई थी ये तस्वीर, जो है भले ही सूडान की, इसमें नतीजा साफ दिखता है बापू की अनदेखी का. एक बच्चा मर रहा है- भूख से, बेचारा मर तो रहा था पैदा होने के बाद से ही, लेकिन इस वक्त उसका कंकाल ले रहा है आखिरी सांस. इसके ठीक पीछे ताक लगाए बैठा है चील- कि कब ये आदमी का बच्चा अपनी आखिरी सांस ले, और वो अपनी अंतड़ियों की ऐंठन शांत करें.
जरा गौर करिए चील की इंसानियत पर, वो चाहे तो 'मर चुके से' बच्चे को एक ही झपट्टे में साफ कर दे, लेकिन वो आदमी की अनदेखी से मर रहे बच्चे का आखिरी सांस लेने तक इंतजार कर रहा है. कितना दर्दनाक आदर्श स्थापित कर रहा है ये चील!

इससे भी खौफनाक है उस फोटोग्राफर केविन कार्टर की हकीकत, जो इस सीन को अपने कैमरे में कैद तो कर लाए, लेकिन इसके बाद चैन की नींद नहीं सो पाए, अपने ईर्द गिर्द बुनी हुई आधुनिकता से उन्हें घिन होने लगी, विकास के महल उन्हें खोखले नजर आने लगे, वो अवसाद में चले गए, तीन महीने बाद ही उन्होंने आत्महत्या कर ली!

मंगलवार, जनवरी 29, 2008

देखिए और बूझिए...


पहेली नहीं है कोई जनाब, सीन है, दो तस्वीरों का एक सीन. रचने वाले ने फिलॉसफी बड़ी अच्छी दी है- तस्वीरें बोलती हैं, और जब ये बोलती हैं, तो बंदे का चुप रहना ही बेहतर है. और इन दो चित्रों में तो और भी क्योंकि इनके किरदार बेहद साफ(फेमस) हैं. आखिर अमिताभ जी, अमर जी, जया जी, अभिषेक और ऐश को कौन नहीं जानता. मगर...

मगर, इन चित्रों में मौजूद ये 'मगर' तमाम किरदारों से बड़ा है- जिस तरह पूजा पर बैठे अभिषेख अमर सिंह जी की तरफ देख रहे हैं, और जिस तरह अमर सिंह जी के बगल में खड़ी जया जी 'सोचनीय' मुद्रा में खड़ी हैं. तो हम भी चुप ही हो लेते हैं, लेकिन उससे पहले संक्षिप्त भूमिका- एक तस्वीर तब की है जब ऐश के नाम पर बाराबंकी में कॉलेज खुला, और दूसरा एक अवार्ड फंक्शन, और ये दोनों ही तस्वीरें अलग अलग मौकों पर अलग अलग अखबारों में छप चुकी हैं. इंटरेस्टिंग लगीं हमें बस इसमें यही नई बात है. जिन्होंने भी इन्हें क्लिक क्या, बड़ा 'डिसाइसिव मोमेंट' कैप्चर किया है. तो बस देखिए और बूझिए...!